कक्षा 10 भूगोल के इस महत्वपूर्ण भाग में हम ‘भारत में संसाधन नियोजन’ (Resource Planning) और ‘भू-संसाधनों’ (Land Resources) के उपयोग का विस्तार से अध्ययन करेंगे। यूपी बोर्ड परीक्षा में संसाधनों के संरक्षण पर महात्मा गांधी के विचार और भारत की भू-आकृतियों (मैदान, पर्वत, पठार) के प्रतिशत से जुड़े प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। आइए इस विषय को आसान और स्पष्ट भाषा में समझें।
भारत में संसाधन नियोजन की आवश्यकता
संसाधनों के सही और विवेकपूर्ण उपयोग के लिए ‘नियोजन’ (प्लानिंग) एक बहुत ही आवश्यक रणनीति है। भारत जैसे विशाल देश में जहाँ संसाधनों की उपलब्धता में बहुत अधिक विविधता है, वहाँ यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत में कुछ ऐसे प्रदेश हैं जहाँ एक तरह के संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं, लेकिन दूसरे संसाधनों की भारी कमी है:
- झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़: इन राज्यों में खनिजों और कोयले के प्रचुर भंडार हैं।
- अरुणाचल प्रदेश: यहाँ जल संसाधन बहुत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, लेकिन बुनियादी विकास (इन्फ्रास्ट्रक्चर) की भारी कमी है।
- राजस्थान: इस राज्य में पवन और सौर ऊर्जा की बहुतायत है, लेकिन यहाँ जल संसाधनों की बहुत कमी है।
- लद्दाख: यह एक शीत मरुस्थल है जो सांस्कृतिक विरासत का धनी है, परंतु यहाँ जल और महत्वपूर्ण खनिजों की कमी है।
इसीलिए राष्ट्रीय, प्रांतीय और स्थानीय स्तर पर एक संतुलित ‘संसाधन नियोजन’ की आवश्यकता होती है।
संसाधन नियोजन के मुख्य सोपान (कदम)
भारत में संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है, जिसके तीन मुख्य सोपान (Steps) हैं:
- देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान करके उनकी तालिका (List) बनाना। इसमें क्षेत्रीय सर्वेक्षण और मानचित्र बनाना शामिल है।
- संसाधन विकास योजनाएँ लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी (तकनीक), कौशल और संस्थागत ढाँचा तैयार करना।
- संसाधन विकास योजनाओं और ‘राष्ट्रीय विकास योजनाओं’ के बीच सही तालमेल (समन्वय) स्थापित करना।
संसाधनों का संरक्षण और गांधी जी के विचार
संसाधनों के बिना सोचे-समझे उपयोग से कई पर्यावरणीय और सामाजिक समस्याएँ पैदा हो जाती हैं। इसलिए विभिन्न स्तरों पर इनका संरक्षण (बचाव) ज़रूरी है। महात्मा गांधी ने संसाधनों के संरक्षण पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा था:
“हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति के लिए बहुत कुछ है, लेकिन किसी के लालच की संतुष्टि के लिए नहीं। अर्थात् हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत है, लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं।”
गांधी जी अत्यधिक उत्पादन के खिलाफ थे और इसके स्थान पर अधिक बड़े जनसमुदाय द्वारा उत्पादन के पक्षधर थे। 1987 में ‘बुन्ड्टलैंड आयोग’ की रिपोर्ट ने वैश्विक स्तर पर संसाधन संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
भारत में भू-संसाधन (भूमि के प्रकार)
भूमि एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है, जिस पर हमारे सारे आर्थिक काम होते हैं। भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर है। भारत में भूमि पर मुख्य रूप से तीन प्रकार की भू-आकृतियाँ पाई जाती हैं:
- मैदान (43 प्रतिशत): यह देश का सबसे बड़ा भू-भाग है, जो कृषि और उद्योगों के विकास के लिए सबसे सुविधाजनक है।
- पर्वत (30 प्रतिशत): पर्वत बारहमासी नदियों के प्रवाह को सुनिश्चित करते हैं और पर्यटन विकास के लिए अनुकूल हैं।
- पठार (27 प्रतिशत): पठारी क्षेत्रों में खनिजों, जीवाश्म ईंधनों और वनों का अपार संचय कोष (भंडार) मौजूद है।
भू-उपयोग (भूमि का इस्तेमाल)
भारत में उपलब्ध भूमि का उपयोग निम्नलिखित मुख्य उद्देश्यों के लिए किया जाता है:
- वन: पर्यावरण को संतुलित रखने के लिए भौगोलिक क्षेत्र के 33% हिस्से पर वन होने चाहिए।
- कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि: इसमें बंजर भूमि (पहाड़ी चट्टानें, मरुस्थल) और गैर-कृषि कामों में लगी भूमि (बस्तियाँ, सड़कें, उद्योग) शामिल हैं।
- परती भूमि: वह भूमि जहाँ कुछ समय के लिए खेती रोक दी जाती है ताकि मिट्टी की उपजाऊ शक्ति वापस आ सके।
- शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्र: वह भूमि जिस पर एक कृषि वर्ष में फसलें उगाई और काटी जाती हैं।
अब खेलें: संसाधन नियोजन और भू-संसाधन क्विज़
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अध्याय 1 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- मुख्य पृष्ठ: संसाधन एवं विकास – सम्पूर्ण अध्याय
- भाग 1: संसाधन: प्रकार और वर्गीकरण
- भाग 2: संसाधनों का विकास और सतत् पोषणीय विकास
- You are Reading Here: भारत में संसाधन नियोजन और भू-संसाधन
- भाग 4: मृदा संसाधन: जलोढ़, काली और लाल मृदा
- भाग 5: मृदा अपरदन, भूमि निम्नीकरण और संरक्षण