कक्षा 10 भूगोल के अध्याय ‘संसाधन एवं विकास’ के इस चौथे भाग में हम भारत के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन—’मृदा’ (मिट्टी) और उसके विभिन्न प्रकारों का विस्तार से अध्ययन करेंगे। यूपी बोर्ड परीक्षा में “जलोढ़ और काली मिट्टी की विशेषताएँ” या “खादर और बांगर में अंतर” जैसे प्रश्न हर साल लघु और दीर्घ उत्तरीय खंड में पूछे जाते हैं। आइए भारत की विभिन्न प्रकार की मिट्टियों को आसान भाषा में समझें।
मृदा (मिट्टी) संसाधन क्या है?
मिट्टी अथवा मृदा सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। यह पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीवों का पोषण करती है और पौधों के विकास का मुख्य माध्यम है। कुछ सेंटीमीटर गहरी मृदा बनने में लाखों वर्ष लग जाते हैं। मृदा बनने की प्रक्रिया में जलवायु, वनस्पति, तापमान परिवर्तन, बहते जल की क्रिया, पवन और हिमनदी मुख्य कारक होते हैं।
भारत में मृदाओं का वर्गीकरण
भारत में अनेक प्रकार की भू-आकृतियाँ और जलवायु पाई जाती हैं, जिसके कारण यहाँ कई प्रकार की मृदाएँ (मिट्टियाँ) विकसित हुई हैं:
1. जलोढ़ मृदा
यह भारत की सबसे महत्वपूर्ण और विस्तृत रूप से फैली हुई मृदा है। संपूर्ण उत्तरी मैदान इसी जलोढ़ मृदा से बना है। यह हिमालय की तीन महत्वपूर्ण नदियों—सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र—द्वारा बहाकर लाए गए निक्षेपों (मिट्टी) से बनी है।
आयु के आधार पर जलोढ़ मृदा दो प्रकार की होती है:
- बांगर (पुराना जलोढ़): इसमें ‘कंकर’ ग्रंथियों की मात्रा ज्यादा होती है और यह नदी घाटियों से दूर पाई जाती है।
- खादर (नया जलोढ़): यह बांगर की तुलना में ज्यादा महीन कणों वाली और अधिक उपजाऊ होती है।
जलोढ़ मृदाएँ बहुत उपजाऊ होती हैं और इनमें पोटाश, फास्फोरस तथा चूना होता है, जो इन्हें चावल, गेहूँ और गन्ने की खेती के लिए बहुत उपयुक्त बनाता है।
2. काली मृदा
इन मृदाओं का रंग काला होता है और इन्हें ‘रेगर’ मृदाएँ भी कहा जाता है। काली मृदा कपास की खेती के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है, इसलिए इसे ‘काली कपास मृदा’ भी कहते हैं। यह महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा और मध्य प्रदेश के पठार पर पाई जाती है। इसकी नमी धारण करने की क्षमता बहुत अधिक होती है। गर्म मौसम में इसमें गहरी दरारें पड़ जाती हैं, जिससे इसमें अच्छी तरह हवा मिल जाती है।
3. लाल और पीली मृदा
लाल मृदा दक्कन पठार के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में कम वर्षा वाले भागों में पाई जाती है। इन मृदाओं का लाल रंग आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों में लोहे के कणों (लौह धातु) के फैलाव के कारण होता है। जब इस मिट्टी में पानी मिल जाता है (जलयोजन), तो इसका रंग पीला दिखने लगता है।
4. लेटराइट मृदा
लेटराइट शब्द ग्रीक भाषा के ‘लेटर’ (Later) से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘ईंट’। यह मृदा भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में अत्यधिक निक्षालन (Leaching) के कारण बनती है। यह मिट्टी काफी अम्लीय होती है और इसमें पोषक तत्वों की कमी होती है। उचित तकनीक अपनाकर कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में इस मृदा पर चाय और कॉफी उगाई जाती है।
5. मरुस्थली मृदा
मरुस्थली मृदाओं का रंग लाल और भूरा होता है। ये आमतौर पर रेतीली और लवणीय (नमकीन) होती हैं। शुष्क जलवायु और उच्च तापमान के कारण इसमें नमी की कमी होती है। इसे सही तरीके से सिंचित करके कृषि योग्य बनाया जा सकता है, जैसा कि पश्चिमी राजस्थान में हो रहा है।
अब खेलें: मृदा संसाधन और प्रकार क्विज़
नीचे दिए गए ‘Play Quiz’ बटन पर क्लिक करें और भारत की मिट्टियों (जलोढ़, काली, लाल, लेटराइट) पर आधारित इन 20 महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें!
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अध्याय 1 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- मुख्य पृष्ठ: संसाधन एवं विकास – सम्पूर्ण अध्याय
- भाग 1: संसाधन: प्रकार और वर्गीकरण
- भाग 2: संसाधनों का विकास और सतत् पोषणीय विकास
- भाग 3: भारत में संसाधन नियोजन और भू-संसाधन
- You are Reading Here: मृदा संसाधन: जलोढ़, काली और लाल मृदा
- भाग 5: मृदा अपरदन, भूमि निम्नीकरण और संरक्षण