हमारी पृथ्वी को ‘नीला ग्रह’ कहा जाता है क्योंकि इसका तीन-चौथाई धरातल जल से ढका हुआ है। अंतरिक्ष से देखने पर यह एक पानी की नीली गेंद जैसी दिखाई देती है। परंतु, इस विशाल जल भंडार के बावजूद, एक बहुत बड़ा सच यह भी है कि इसमें से प्रयोग में लाने योग्य मीठे पानी (अलवणीय जल) का अनुपात बहुत ही कम है। यह थोड़ा सा मीठा जल हमें मुख्य रूप से सतही अपवाह (नदियों, झीलों) और भौमजल स्रोतों (जमीन के नीचे का पानी) से प्राप्त होता है। प्रकृति में जलीय चक्र (Hydrological Cycle) लगातार चलता रहता है, जिससे यह पानी वाष्प बनकर उड़ता है और फिर बारिश के रूप में धरती पर वापस आता है। इसी प्रक्रिया के कारण जल एक ‘नवीकरण योग्य संसाधन’ बन जाता है। इस अध्याय में हम विस्तार से समझेंगे कि जब पानी बार-बार नया हो जाता है, तो फिर दुनिया में जल की इतनी कमी क्यों है, और इसे बचाने के लिए हमें क्या कदम उठाने चाहिए।
जल दुर्लभता और जल संरक्षण की आवश्यकता
जैसे ही हम ‘जल की कमी’ या ‘जल दुर्लभता’ की बात करते हैं, हमारे दिमाग में तुरंत कम बारिश वाले इलाके, सूखे खेत, या मीलों दूर से पानी भरकर लाती हुई राजस्थान की महिलाओं (पनिहारिनों) का चित्र उभर आता है। लेकिन जल दुर्लभता का कारण केवल कम वर्षा नहीं है। आज दुनिया के कई ऐसे हिस्से हैं जहाँ बारिश तो अच्छी होती है, फिर भी वहाँ पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलता। जल दुर्लभता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
मात्रात्मक कमी (Quantitative Scarcity): बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए न केवल पीने और घरेलू उपयोग के लिए अधिक पानी चाहिए, बल्कि इतने सारे लोगों के लिए अनाज उगाने के लिए भी भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। कृषि क्षेत्र में सिंचाई के लिए पानी का सबसे अधिक उपयोग होता है। किसान शुष्क मौसम में भी खेती करने के लिए ट्यूबवेल लगाकर ज़मीन के नीचे के पानी का अति-शोषण कर रहे हैं, जिससे जल स्तर तेज़ी से नीचे गिर रहा है। इसके अतिरिक्त, तेज़ औद्योगीकरण और शहरीकरण ने भी जल संसाधनों पर भारी दबाव डाला है। शहरों में बढ़ती आबादी और आधुनिक जीवनशैली के कारण पानी की माँग बेतहाशा बढ़ गई है।
गुणात्मक कमी (Qualitative Scarcity): कई जगह पानी तो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन वह इतना गंदा है कि इंसान उसे पी नहीं सकता। कारखानों से निकलने वाला जहरीला कचरा, कृषि में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक, और शहरों का घरेलू कचरा नदियों और तालाबों में बहा दिया जाता है। इस प्रदूषण के कारण हमारा जल मनुष्य के उपयोग के लिए खतरनाक हो गया है। इसलिए, यह समय की माँग है कि हम अपने जीवन को सुरक्षित रखने और पर्यावरण को बचाने के लिए जल का सही तरीके से प्रबंधन और संरक्षण करें।
बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ (बाँध)
जल संरक्षण और प्रबंधन के लिए प्राचीन काल से ही भारत में बाँध, झीलें और नहरें बनाई जाती रही हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत में नदियों पर बड़े-बड़े बाँध बनाए गए। इन परियोजनाओं को ‘बहुउद्देशीय परियोजनाएँ’ कहा जाता है क्योंकि एक ही बाँध से कई सारे उद्देश्य पूरे होते हैं। उदाहरण के लिए, इनसे खेतों की सिंचाई होती है, बिजली पैदा की जाती है, बाढ़ को नियंत्रित किया जाता है, मछली पालन होता है, और शहरों व उद्योगों को पानी मिलता है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इन बड़े बाँधों को ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ कहा था, क्योंकि उनका मानना था कि इनसे कृषि और उद्योग दोनों का एक साथ विकास होगा। सतलुज-व्यास बेसिन पर ‘भाखड़ा नांगल’ और महानदी पर ‘हीराकुड’ बाँध इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
बाँधों का विरोध और समस्याएँ
हालाँकि बड़े बाँधों के कई फायदे हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इनका भारी विरोध भी हुआ है। ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ और ‘टिहरी बाँध आंदोलन’ जैसे बड़े जन-आंदोलन इन्ही परियोजनाओं के खिलाफ खड़े हुए। बाँध बनाने से नदियों का प्राकृतिक बहाव रुक जाता है, जिससे उनके तल में अत्यधिक तलछट (गाद) जमा हो जाती है। इससे पानी में रहने वाले जीवों का जीवन खतरे में पड़ जाता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि जहाँ बाँध बनाया जाता है, वहाँ का एक बहुत बड़ा इलाका पानी में डूब जाता है। इससे वहाँ के जंगल नष्ट हो जाते हैं और स्थानीय आदिवासियों व किसानों को अपनी ज़मीन और घर छोड़कर विस्थापित होना पड़ता है। कई बार तो ये बाँध बाढ़ को रोकने के बजाय खुद बाढ़ का कारण बन जाते हैं जब भारी बारिश में अचानक से बहुत सारा पानी छोड़ना पड़ता है। इसके अलावा, दो राज्यों के बीच पानी के बँटवारे को लेकर होने वाले अंतर्राज्यीय विवाद भी बढ़ते जा रहे हैं।
वर्षा जल संग्रहण (Rainwater Harvesting)
बड़े बाँधों के नुकसान और विवादों को देखते हुए, ‘वर्षा जल संग्रहण’ एक बहुत ही सुरक्षित, सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल तरीका माना जाता है। भारत में प्राचीन काल से ही बारिश के पानी को बचाने के बेहतरीन तरीके रहे हैं:
पहाड़ी क्षेत्रों में: पश्चिमी हिमालय के पहाड़ी इलाकों में लोग पानी को खेतों तक ले जाने के लिए ‘गुल’ अथवा ‘कुल’ नामक छोटी नहरें बनाते हैं।
शुष्क क्षेत्रों में: राजस्थान जैसे अर्ध-शुष्क और शुष्क इलाकों में बारिश के पानी को खेतों में रोकने के लिए बड़े गड्ढे बनाए जाते हैं ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे। इन्हें जैसलमेर में ‘खादीन’ और अन्य इलाकों में ‘जोहड़’ कहा जाता है।
छत वर्षा जल संग्रहण: राजस्थान के बीकानेर, बाड़मेर और फलोदी जैसे क्षेत्रों में घरों की ढलवाँ छतों पर गिरने वाले बारिश के पानी को पाइप के ज़रिये ज़मीन के नीचे बने एक बड़े टैंक (‘टाँका’) में इकट्ठा किया जाता है। यह पानी गर्मी के मौसम में पीने के काम आता है और इसे शुद्ध प्राकृतिक जल (‘पालर पानी’) माना जाता है। मेघालय में तो बाँस के पाइपों द्वारा झरने के पानी को मीलों दूर तक ले जाकर पौधों की सिंचाई की जाती है। आज के समय में शहरों में भी छतों से बारिश का पानी बचाना बहुत ज़रूरी हो गया है ताकि गिरते हुए भूजल स्तर को दोबारा ऊपर उठाया जा सके।
अध्याय के महत्वपूर्ण भाग (माइक्रो-लेसन्स)
इस अध्याय की विषय-सामग्री को गहराई से समझने के लिए हमने इसे निम्नलिखित छोटे भागों में बाँटा है। नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके आप इन्हें पढ़ सकते हैं:
- भाग 1: जल दुर्लभता और जल संरक्षण की आवश्यकता
- भाग 2: बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ और उनके प्रभाव
- भाग 3: वर्षा जल संग्रहण की पारंपरिक और आधुनिक विधियाँ
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