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भाग 3: अखाद्य फसलें, तकनीकी सुधार और भूदान आंदोलन

कक्षा 10 भूगोल के अध्याय 4 ‘कृषि’ के इस तीसरे और अंतिम भाग में आपका स्वागत है। पिछले भागों में हमने भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसलों (जैसे चावल, गेहूँ, दालें) और नकदी फसलों (जैसे गन्ना और तिलहन) के बारे में विस्तार से पढ़ा था। कृषि केवल भोजन ही नहीं देती, बल्कि हमारे दैनिक जीवन और उद्योगों के लिए कई ऐसी महत्वपूर्ण वस्तुएँ भी उत्पन्न करती है जिन्हें हम खा नहीं सकते, लेकिन उनके बिना हमारे उद्योगों और अर्थव्यवस्था का पहिया रुक जाएगा। इन फसलों को अखाद्य फसलें कहा जाता है। इसके साथ ही, इस भाग में हम यह भी जानेंगे कि आज़ादी के बाद से लेकर अब तक भारत सरकार ने किसानों की भलाई और कृषि के विकास के लिए कौन-कौन से प्रौद्योगिकीय और संस्थागत सुधार किए हैं, और विश्व प्रसिद्ध भूदान-ग्रामदान आंदोलन क्या था।

भारत की प्रमुख अखाद्य फसलें

अखाद्य फसलें वे होती हैं जिनका उपयोग भोजन के रूप में नहीं किया जाता, बल्कि ये मुख्य रूप से उद्योगों में कच्चे माल के रूप में काम आती हैं। इनमें रबड़ और विभिन्न रेशेदार फसलें प्रमुख हैं।

रबड़

रबड़ मुख्य रूप से भूमध्यरेखीय क्षेत्र की फसल है, परंतु विशेष परिस्थितियों में इसे उष्ण और उपोष्ण क्षेत्रों में भी उगाया जाता है। रबड़ की खेती के लिए 200 सेंटीमीटर से अधिक वर्षा और 25° सेल्सियस से अधिक तापमान वाली नम और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है। रबड़ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कच्चा माल है जो टायर, ट्यूब, जूते, बेल्ट और विभिन्न औद्योगिक उत्पाद बनाने में प्रयुक्त होता है। भारत में इसे मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, अंडमान निकोबार द्वीप समूह और मेघालय की गारो पहाड़ियों में उगाया जाता है।

रेशेदार फसलें

भारत में उगाई जाने वाली चार मुख्य रेशेदार फसलें हैं—कपास, जूट, सन और प्राकृतिक रेशम। इनमें से पहली तीन (कपास, जूट और सन) मिट्टी में फसल उगाने से प्राप्त होती हैं, जबकि चौथा (रेशम) रेशम के कीड़ों के कोकून से प्राप्त होता है। रेशम प्राप्त करने के लिए रेशम के कीड़ों (जो मलबरी पेड़ की हरी पत्तियों पर पलते हैं) का पालन किया जाता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में सेरीकल्चर या रेशम उत्पादन कहा जाता है।

कपास

भारत को कपास के पौधे का मूल स्थान माना जाता है। सूती कपड़ा उद्योग के लिए कपास सबसे मुख्य कच्चा माल है। उत्पादन की दृष्टि से विश्व में चीन के बाद भारत का दूसरा स्थान है। कपास की फसल के लिए दक्कन पठार के शुष्कतर भागों की काली मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इसे उगाने के लिए उच्च तापमान, हल्की वर्षा या सिंचाई, और सबसे महत्वपूर्ण 210 पाला रहित दिन तथा खिली धूप की आवश्यकता होती है। यह एक खरीफ की फसल है जिसे पककर तैयार होने में 6 से 8 महीने लगते हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश कपास के मुख्य उत्पादक राज्य हैं।

जूट

जूट को भारत का सुनहरा रेशा कहा जाता है। इसकी खेती बाढ़ के मैदानों की जल निकास वाली अत्यधिक उर्वरक (उपजाऊ) मिट्टी में की जाती है, जहाँ बाढ़ के कारण हर वर्ष नई मिट्टी जमा होती रहती है। इसके बढ़ने के समय उच्च तापमान की आवश्यकता होती है। पश्चिम बंगाल, बिहार, असम और ओडिशा जूट के मुख्य उत्पादक राज्य हैं। इसका उपयोग मुख्य रूप से बोरियाँ, चटाई, रस्सी, धागे, गलीचे और दस्तकारी की अन्य वस्तुएँ बनाने में होता है। हालाँकि, इसकी ऊँची लागत के कारण आजकल सिंथेटिक रेशों (नायलॉन आदि) से इसे बाज़ार में कड़ी चुनौती मिल रही है।

प्रौद्योगिकीय और संस्थागत सुधार

भारत में हज़ारों वर्षों से कृषि की जा रही है, परंतु प्रौद्योगिकी और संस्थागत परिवर्तनों के अभाव में कृषि का विकास अवरुद्ध हो गया था। स्वतंत्रता के बाद देश की बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने और किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए सरकार ने कई गंभीर और ठोस कदम उठाए:

संस्थागत सुधार

आज़ादी के बाद ज़मींदारी प्रथा को समाप्त करना, जोतों की चकबंदी करना और सहकारिता को बढ़ावा देना प्रथम पंचवर्षीय योजना का मुख्य लक्ष्य था। भूमि पर पुश्तैनी अधिकार के कारण खेतों का आकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी छोटा होता जा रहा था, इसलिए ज़मीनों की चकबंदी करना बहुत अनिवार्य हो गया था। भूमि सुधार के कानून तो बने परंतु इन्हें लागू करने में ढील की गई।

तकनीकी सुधार

1960 और 1970 के दशकों में भारत सरकार ने ‘पैकेज टेक्नोलॉजी’ पर आधारित हरित क्रांति और श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड) जैसी रणनीतियाँ आरंभ कीं। 1980 और 1990 के दशकों में एक ‘व्यापक भूमि विकास कार्यक्रम’ शुरू किया गया। किसानों को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराने के लिए ग्रामीण बैंकों और सहकारी समितियों की स्थापना की गई। सूखा, बाढ़, चक्रवात, आग और बीमारी से फसल नष्ट होने पर किसानों की मदद के लिए फसल बीमा का प्रावधान किया गया।

किसानों के लिए विशेष योजनाएँ

सरकार ने किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) और व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना (PAIS) शुरू की है। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर किसानों के लिए मौसम की जानकारी और कृषि से संबंधित विशेष कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात, किसानों को बिचौलियों और दलालों के शोषण से बचाने के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और लाभदायक खरीद मूल्यों की घोषणा करती है।

भूदान-ग्रामदान और रक्तहीन क्रांति

महात्मा गांधी ने विनोबा भावे को अपना आध्यात्मिक उत्तराधिकारी घोषित किया था। गांधी जी की शहादत के बाद उनके ग्राम स्वराज के संदेश को लोगों तक पहुँचाने के लिए विनोबा भावे ने पूरे देश की पदयात्रा की। जब वे तेलंगाना के पोचमपल्ली गाँव में पहुँचे, तो वहाँ के कुछ गरीब भूमिहीन ग्रामीणों ने उनसे अपने आर्थिक भरण-पोषण के लिए कुछ ज़मीन माँगी। उसी समय एक ऐतिहासिक घटना घटी—गाँव के एक संपन्न व्यक्ति श्री राम चन्द्र रेड्डी उठ खड़े हुए और उन्होंने अपनी 80 एकड़ भूमि उन 80 भूमिहीन ग्रामीणों को दान में दे दी। इस महान कार्य को भूदान के नाम से जाना गया।

विनोबा भावे ने इस विचार को पूरे भारत में फैलाया। इससे प्रेरित होकर कई बड़े ज़मींदारों ने तो अपने पूरे के पूरे गाँव ही दान कर दिए, जिसे ग्रामदान कहा गया। विनोबा भावे द्वारा शुरू किए गए इस अद्वितीय स्वैच्छिक आंदोलन को भारत के इतिहास में रक्तहीन क्रांति का नाम दिया गया है, क्योंकि बिना किसी हिंसा या लड़ाई-झगड़े के इसमें भूमि सुधार का एक बहुत बड़ा सामाजिक बदलाव लाया गया।

👨‍🏫 शिक्षक की सलाह: बोर्ड परीक्षा में “कपास की खेती के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ” और “सरकार द्वारा किए गए संस्थागत व तकनीकी सुधारों की सूची” दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों में अक्सर पूछे जाते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और रक्तहीन क्रांति (भूदान-ग्रामदान) पर संक्षिप्त टिप्पणी (Short Note) लिखने का अभ्यास ज़रूर करें।

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महत्वपूर्ण कृषि परिभाषाएँ और सुधार

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