कक्षा 10 भूगोल (Geography) की हमारी इस शानदार कक्षा में आपका बहुत-बहुत स्वागत है। आज हम भूगोल का पहला और सबसे महत्वपूर्ण अध्याय शुरू करने जा रहे हैं—‘संसाधन एवं विकास’।
हमारे चारों ओर मौजूद हर वह चीज़ जो हमारी ज़रूरतें पूरी करती है, ‘संसाधन’ कहलाती है। लेकिन क्या ये संसाधन हमेशा ऐसे ही रहेंगे? मिट्टी, पानी और जंगल जैसे संसाधनों का अगर हम अंधाधुंध उपयोग करेंगे, तो हमारी पृथ्वी का भविष्य क्या होगा? इस विस्तृत अध्याय को आसानी से समझने के लिए, मैंने इसे 5 छोटे-छोटे भागों (माइक्रो-लेसन्स) में बाँट दिया है:
- भाग 1: संसाधन: प्रकार और वर्गीकरण
- भाग 2: संसाधनों का विकास और सतत् पोषणीय विकास
- भाग 3: भारत में संसाधन नियोजन और भू-संसाधन
- भाग 4: मृदा संसाधन: जलोढ़, काली और लाल मृदा
- भाग 5: मृदा अपरदन, भूमि निम्नीकरण और संरक्षण
संसाधन क्या हैं और इनका वर्गीकरण
हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयोग की जा सकती है और जिसे बनाने के लिए प्रौद्योगिकी (तकनीक) उपलब्ध है, एक ‘संसाधन’ है। संसाधनों को मुख्य रूप से प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों में बाँटा गया है। इसके अलावा उत्पत्ति के आधार पर (जैव और अजैव), समाप्यता के आधार पर (नवीकरण और अनवीकरण), और स्वामित्व के आधार पर (व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय) भी इनका वर्गीकरण किया गया है।
सतत् पोषणीय विकास और एजेंडा इक्कीस
संसाधनों के अंधाधुंध इस्तेमाल से ओजोन परत में छेद और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएँ पैदा हो गई हैं। इसलिए ‘सतत् पोषणीय विकास’ बहुत ज़रूरी है—जिसका अर्थ है कि विकास ऐसा हो जो पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाए और भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी संसाधन बचे रहें। इसी लक्ष्य को पाने के लिए 1992 में ब्राज़ील के रियो डी जेनेरो में ‘पृथ्वी सम्मेलन’ हुआ और ‘एजेंडा 21’ को स्वीकार किया गया।
भारत में भू-संसाधन और भूमि का उपयोग
भारत में विभिन्न प्रकार की भू-आकृतियाँ हैं: 43% मैदान, 30% पर्वत और 27% पठार। भूमि एक सीमित संसाधन है। वनों की कटाई, अत्यधिक पशुचारण और अधिक सिंचाई के कारण हमारी ज़मीन खराब हो रही है, जिसे ‘भूमि निम्नीकरण’ कहा जाता है। हमें वनारोपण (पेड़ लगाकर) और चरागाहों का सही प्रबंधन करके अपनी ज़मीन को बचाना होगा।
मृदा (मिट्टी) संसाधन और इसके प्रकार
मिट्टी सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। भारत में मुख्य रूप से जलोढ़, काली, लाल-पीली, लेटराइट और मरुस्थली मृदा पाई जाती है। जलोढ़ मृदा सबसे उपजाऊ होती है जिससे उत्तरी मैदान बने हैं। कपास की खेती के लिए काली मृदा सबसे अच्छी मानी जाती है।
मृदा अपरदन और संरक्षण के उपाय
पानी के बहाव या तेज़ हवा के कारण मिट्टी की ऊपरी परत का कटकर बह जाना ‘मृदा अपरदन’ कहलाता है। पहाड़ी ढलानों पर सीढ़ीदार खेती (सोपान कृषि) करके, पेड़ों को कतारों में लगाकर (रक्षक मेखला) और पट्टी कृषि के माध्यम से हम मिट्टी के कटाव को रोक सकते हैं।
अब खेलें: संसाधन एवं विकास प्रारंभिक क्विज़
यूपी बोर्ड कक्षा 10 भूगोल के इस पहले अध्याय के परिचय पर आधारित मजेदार क्विज़ को खेलें और अपनी प्रारंभिक जानकारी की जाँच करें!
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