कृषि की दृष्टि से भारत विश्व का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण देश है। हमारी लगभग दो-तिहाई जनसंख्या आजीविका के लिए कृषि कार्यों में संलग्न है। कृषि न केवल हमारे लिए खाद्यान्न उत्पन्न करती है, बल्कि यह विभिन्न उद्योगों के लिए कच्चा माल भी प्रदान करती है। चाय, कॉफी और मसालों जैसे उत्पादों के निर्यात से हमें विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होती है। हज़ारों वर्षों के लंबे सफर में भौतिक पर्यावरण, प्रौद्योगिकी और सामाजिक-सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के अनुसार भारत में खेती करने की विधियों में बड़े और सार्थक परिवर्तन आए हैं। इस अध्याय में हम कृषि के विभिन्न प्रकारों, शस्य प्रारूपों, भारत की प्रमुख फसलों, और सरकार द्वारा किए गए तकनीकी व संस्थागत सुधारों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
कृषि के प्रकार
भारत में खेती की पद्धतियाँ अलग-अलग क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न हैं:
- प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि: यह आदिम औजारों और परिवार के श्रम से की जाने वाली खेती है। इसे ‘कर्तन दहन प्रणाली’ (Slash and Burn) भी कहते हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर-पूर्वी राज्यों में इसे ‘झूम’ खेती कहा जाता है।
- गहन जीविका कृषि: यह उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ भूमि पर जनसंख्या का दबाव अधिक होता है। यहाँ अधिक उत्पादन के लिए रासायनिक खाद और सिंचाई का खूब प्रयोग होता है।
- वाणिज्यिक कृषि: इसमें उच्च पैदावार देने वाले बीजों और आधुनिक मशीनों का प्रयोग करके बाज़ार के लिए उत्पादन किया जाता है। पंजाब और हरियाणा में चावल इसी श्रेणी में आता है।
- रोपण कृषि: यह एक प्रकार की वाणिज्यिक खेती है जिसमें बड़े क्षेत्र में केवल एक ही फसल (जैसे चाय, कॉफी, रबर, गन्ना) उगाई जाती है।
शस्य प्रारूप (Cropping Pattern)
भारत में फसलें तीन ऋतुओं में उगाई जाती हैं:
- रबी: शीत ऋतु में बोई जाती है (गेहूँ, जौ, चना)।
- खरीफ: मानसून के आगमन पर बोई जाती है (चावल, मक्का, कपास)।
- ज़ायद: रबी और खरीफ के बीच के छोटे मौसम में उगाई जाती है (तरबूज़, खीरा, सब्जियाँ)।
प्रमुख फसलें
मिट्टी और जलवायु के अंतर के कारण भारत में विविधतापूर्ण फसलें उगाई जाती हैं:
- खाद्यान्न: चावल (प्रमुख फसल), गेहूँ, मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी), और दालें।
- खाद्य (अन्न के अलावा): गन्ना, तिलहन, चाय, कॉफी, बागवानी फसलें।
- अखाद्य फसलें: रबड़, कपास (सुनहरा रेशा जूट को कहा जाता है)।
प्रौद्योगिकीय और संस्थागत सुधार
स्वतंत्रता के बाद सरकार ने ज़मींदारी प्रथा को समाप्त किया, चकबंदी की और हरित क्रांति व श्वेत क्रांति को बढ़ावा दिया। आज किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा, और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी सुविधाओं का लाभ मिल रहा है। विनोबा भावे द्वारा शुरू किया गया ‘भूदान-ग्रामदान’ आंदोलन, जिसे ‘रक्तहीन क्रांति’ कहा गया, भूमि सुधार की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था।
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महत्वपूर्ण लिंक
- You are Reading Here: अध्याय 4: कृषि (Agriculture) – सम्पूर्ण व्याख्या
- भाग 1: कृषि के प्रकार और शस्य प्रारूप (रबी, खरीफ, ज़ायद)
- भाग 2: प्रमुख खाद्यान्न और नकदी फसलें
- भाग 3: अखाद्य फसलें, तकनीकी सुधार और भूदान आंदोलन