वन संरक्षण की नीतियाँ हमारे देश में कोई नई बात नहीं हैं। भारत में जंगल केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं हैं, बल्कि ये कई पारंपरिक समुदायों और जनजातियों के आवास भी हैं। सदियों से यहाँ के स्थानीय लोग अपने आवास स्थलों और जंगलों के संरक्षण में जुटे हुए हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि उनके जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति इन्हीं जंगलों से होती है। इस भाग में हम भारत के प्रमुख जन-आंदोलनों और वन संरक्षण में समुदायों की भूमिका का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
वन संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका
भारत के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय समुदायों ने वन और वन्य जीवों को बचाने के लिए अभूतपूर्व कार्य किए हैं। कई बार तो उन्होंने सरकार की ओर से होने वाले हस्तक्षेप को भी नकार दिया है और स्वयं कमान सँभाली है:
- सरिस्का बाघ रिजर्व: राजस्थान के सरिस्का क्षेत्र में गाँवों के लोग वन्य जीव रक्षण अधिनियम का सहारा लेकर वहाँ होने वाले खनन कार्यों (Mining) का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।
- भैरोंदेव डाकव ‘सोंचुरी’: राजस्थान के अलवर जिले के 5 गाँवों के लोगों ने मिलकर 1,200 हेक्टेयर वन भूमि को ‘भैरोंदेव डाकव सोंचुरी’ घोषित कर दिया है। उन्होंने अपने स्वयं के नियम-कानून बनाए हैं जो शिकार को पूरी तरह वर्जित करते हैं और बाहरी लोगों की घुसपैठ से वन्य जीवन की रक्षा करते हैं।
पवित्र पेड़ों के झुरमुट और प्रकृति पूजा
भारत में प्रकृति की पूजा एक सदियों पुराना जनजातीय विश्वास है। प्राचीन काल से ही कई समुदाय वनों के कुछ हिस्सों को देवताओं का निवास मानकर उन्हें अछूता छोड़ देते हैं। इन जंगलों को ‘पवित्र पेड़ों के झुरमुट’ कहा जाता है।
- छोटानागपुर क्षेत्र में मुंडा और संथाल जनजातियाँ महुआ और कदंब के पेड़ों की पूजा करती हैं।
- ओडिशा और बिहार की जनजातियाँ शादी के दौरान इमली और आम के पेड़ की पूजा करती हैं।
- राजस्थान में बिश्नोई गाँवों के आस-पास काले हिरण, चिंकारा, नीलगाय और मोरों के झुंड आसानी से देखे जा सकते हैं। बिश्नोई समाज इन्हें अपने परिवार का अभिन्न हिस्सा मानता है और कोई भी इन्हें नुकसान नहीं पहुँचा सकता।
प्रमुख जन-आंदोलन: चिपको और बीज बचाओ
वनों को बचाने और पर्यावरण को सुधारने के लिए भारत में कई बड़े आंदोलन हुए हैं, जिन्होंने दुनिया भर का ध्यान खींचा है:
- चिपको आंदोलन: हिमालय क्षेत्र में यह आंदोलन वन कटाई को रोकने में अत्यधिक सफल रहा। इसमें स्थानीय लोग (विशेषकर महिलाएँ) पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उनसे चिपक जाती थीं। इस आंदोलन ने यह भी दिखाया कि स्थानीय पौधों की जातियों का प्रयोग करके वनीकरण अभियान को सफल बनाया जा सकता है।
- बीज बचाओ आंदोलन और नवदानय: उत्तराखंड के टिहरी में किसानों ने यह आंदोलन चलाया। इन्होंने दिखा दिया कि रासायनिक उर्वरकों (Chemical Fertilizers) के बिना भी पारंपरिक बीजों के प्रयोग से आर्थिक रूप से व्यवहार्य और अच्छी कृषि संभव है।
संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management)
भारत में क्षरित वनों (खराब हो चुके जंगलों) के पुनर्निर्माण के लिए ‘संयुक्त वन प्रबंधन’ (JFM) कार्यक्रम एक बहुत ही शानदार कदम है। इसकी औपचारिक शुरुआत वर्ष 1988 में हुई, जब ओडिशा राज्य ने इसका पहला प्रस्ताव पास किया। इसके तहत गाँव के स्तर पर संस्थाएँ बनाई जाती हैं, जिनमें ग्रामीण और वन विभाग के अधिकारी मिलकर काम करते हैं। इसके बदले समुदायों को गैर-इमारती वन उत्पाद और सफल संरक्षण से प्राप्त इमारती लकड़ी के लाभ में हिस्सा मिलता है।
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महत्वपूर्ण लिंक
- अध्याय 2: वन एवं वन्य जीव संसाधन – सम्पूर्ण व्याख्या
- भाग 1: भारत में वनस्पतिजात और प्राणिजात की स्थिति
- भाग 2: वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 और प्रोजेक्ट टाइगर
- भाग 3: वनों के प्रकार: आरक्षित, रक्षित और अवर्गीकृत वन
- You are Reading Here: भाग 4: समुदाय और वन संरक्षण: चिपको तथा बीज बचाओ आंदोलन