कक्षा 10 भूगोल के अध्याय 3 में आपका स्वागत है। जल, जिसे हम जीवन का आधार मानते हैं, प्रकृति का एक अनमोल उपहार है। जैसा कि हम सभी जानते हैं, हमारी पृथ्वी का लगभग तीन-चौथाई धरातल जल से ढका हुआ है। अंतरिक्ष से देखने पर पृथ्वी नीली दिखाई देती है, इसीलिए इसे ‘नीला ग्रह’ भी कहा जाता है। परंतु, इस विशाल जल भंडार का एक बहुत बड़ा और कड़वा सच यह भी है कि इसमें से हमारे प्रयोग में लाने योग्य ‘अलवणीय जल’ (मीठा पानी) का अनुपात बहुत ही कम है। यह थोड़ा सा अलवणीय जल हमें मुख्य रूप से सतही अपवाह (नदियों, झीलों) और भौमजल स्रोतों (ज़मीन के नीचे का पानी) से प्राप्त होता है। प्रकृति में जलीय चक्र लगातार चलता रहता है, जिससे यह पानी वाष्प बनकर उड़ता है और फिर बारिश के रूप में धरती पर वापस आता है। इसी प्राकृतिक प्रक्रिया के कारण जल एक ‘नवीकरण योग्य संसाधन’ है। फिर भी, आज विश्व के अनेक देशों और क्षेत्रों में जल की भारी कमी महसूस की जा रही है। ऐसी भविष्यवाणी की जा रही है कि वर्ष 2025 तक दुनिया के लगभग 20 करोड़ लोग जल की नितांत कमी को झेलने के लिए मजबूर होंगे। इस भाग में हम विस्तार से समझेंगे कि जल दुर्लभता क्या है और हमें इसका संरक्षण क्यों करना चाहिए।
जल दुर्लभता क्या है?
जैसे ही हम ‘जल की कमी’ या ‘जल दुर्लभता’ की बात करते हैं, तो हमारे मानस पटल पर तुरंत कम बारिश वाले इलाके, सूखे खेत, या राजस्थान के मरुस्थल में चिलचिलाती धूप में सिर पर मटके रखकर मीलों दूर से पानी भरकर लाती हुई महिलाओं (पनिहारिनों) का चित्र उभर आता है। जल दुर्लभता का सीधा सा अर्थ है—लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ जल का उपलब्ध न होना। यह सच है कि वर्षा में वार्षिक और मौसमी परिवर्तन के कारण जल संसाधनों की उपलब्धता में समय और स्थान के अनुसार काफी भिन्नता पाई जाती है। एक ओर इज़राइल जैसे देश में जहाँ औसत वार्षिक वर्षा मात्र 25 सेंटीमीटर है, वहाँ जल का कोई अभाव नहीं है। वहीं दूसरी ओर, 114 सेंटीमीटर औसत वार्षिक वर्षा वाले हमारे देश भारत में प्रति वर्ष किसी न किसी भाग में सूखा अवश्य पड़ता है। इसका मुख्य कारण वर्षा के जल का सही तरीके से संरक्षण न होना है। बारिश का ज़्यादातर पानी नदी-नालों में तेज़ी से बहकर समुद्र में चला जाता है, और हम बूँद-बूँद को तरसते रह जाते हैं।
जल दुर्लभता के मुख्य कारण
जल दुर्लभता के कई कारण हैं, जिन्हें मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जा सकता है: मात्रात्मक कमी (पानी का कम होना) और गुणात्मक कमी (पानी का गंदा होना)। आइए इन कारणों को गहराई से समझें:
1. बढ़ती जनसंख्या और अतिशोषण
जनसंख्या में हो रही बेतहाशा वृद्धि जल संसाधनों पर सबसे बड़ा दबाव डाल रही है। अधिक जनसंख्या के लिए न केवल पीने और घरेलू उपयोग के लिए ज़्यादा पानी चाहिए, बल्कि इतने सारे लोगों का पेट भरने के लिए अधिक अनाज भी उगाना पड़ता है। अनाज का उत्पादन बढ़ाने के लिए जल संसाधनों का अतिशोषण करके सिंचित क्षेत्र बढ़ाया जाता है। आपने देखा होगा कि बहुत से किसान अपने खेतों में निजी कुएँ और नलकूप (ट्यूबवेल) लगाकर सिंचाई करते हैं। इसके कारण ज़मीन के नीचे का जलस्तर (भौम जलस्तर) तेज़ी से नीचे गिर रहा है, जिससे भविष्य में भोजन सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
2. औद्योगीकरण और शहरीकरण
स्वतंत्रता के बाद भारत में तेज़ी से औद्योगीकरण और शहरीकरण हुआ। आज हर जगह बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) और बड़े उद्योग फैले हुए हैं। कारखानों को चलाने के लिए भारी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, मशीनों को चलाने के लिए जिस बिजली की ज़रूरत होती है, उसका एक बड़ा हिस्सा जल विद्युत (Hydroelectric power) से ही आता है। शहरों की बढ़ती आबादी और आधुनिक जीवनशैली के कारण पानी की माँग बहुत बढ़ गई है। आज ज़्यादातर हाउसिंग सोसायटियों और कॉलोनियों में पानी की आपूर्ति के लिए निजी नलकूप लगा दिए गए हैं, जिससे शहरों में भी जल का अतिशोषण हो रहा है।
3. जल की खराब गुणवत्ता (प्रदूषण)
जल दुर्लभता का एक और गंभीर पहलू उसकी खराब गुणवत्ता है। कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ पानी तो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन वह पीने या उपयोग करने लायक नहीं है। कारखानों से निकलने वाला जहरीला रसायन, शहरों का घरेलू कचरा, और कृषि में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक सीधे नदियों और तालाबों में बहा दिए जाते हैं। यह प्रदूषण हमारे जल संसाधनों को ज़हरीला बना रहा है, जो मानव उपयोग के लिए बेहद खतरनाक है।
जल संरक्षण एवं प्रबंधन की आवश्यकता
उपर्युक्त सभी समस्याओं को देखते हुए, यह समय की सबसे बड़ी माँग है कि हम अपने जल संसाधनों का सही तरीके से संरक्षण और प्रबंधन करें। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं, तो दूषित जल पीने से स्वास्थ्य संबंधी गंभीर बीमारियाँ फैल सकती हैं। जल संरक्षण इसलिए भी आवश्यक है ताकि हमारी खाद्यान्न सुरक्षा बनी रहे और हमारी उत्पादक क्रियाओं की निरंतरता सुनिश्चित हो सके। यदि जल संसाधनों का ऐसे ही अतिशोषण और कुप्रबंधन होता रहा, तो हमारा पूरा प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो सकता है।
सरकार द्वारा उठाए गए कदम
भारत सरकार जल संकट से निपटने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। जल जीवन मिशन (JJM) के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की पहल की गई है। इस मिशन का मुख्य लक्ष्य प्रत्येक ग्रामीण परिवार को लंबी अवधि के आधार पर नियमित रूप से प्रति व्यक्ति 55 लीटर पीने योग्य पाइप का पानी उपलब्ध कराना है।
इसके अतिरिक्त, अटल भूजल योजना (अटल जल) सात राज्यों (गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) के उन क्षेत्रों में लागू की जा रही है जहाँ भूजल की भारी कमी है। इस योजना का एक बहुत बड़ा पहलू जनता के व्यवहार में बदलाव लाना है, ताकि लोग जल संरक्षण के प्रति जागरूक हों और पानी का विवेकपूर्ण प्रबंधन कर सकें।
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महत्वपूर्ण लिंक
- अध्याय 3: जल संसाधन – सम्पूर्ण व्याख्या
- You are Reading Here: भाग 1: जल दुर्लभता और जल संरक्षण की आवश्यकता
- भाग 2: बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ और उनके प्रभाव
- भाग 3: वर्षा जल संग्रहण की पारंपरिक और आधुनिक विधियाँ