भारत एक महान कृषि प्रधान देश है जहाँ की सभ्यता और संस्कृति खेतों की माटी से गहराई से जुड़ी हुई है। यदि हम आर्थिक दृष्टि से देखें, तो भारत की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह से कृषि कार्यों पर निर्भर है। कृषि केवल एक पेशा नहीं है, बल्कि यह एक प्राथमिक आर्थिक क्रिया है जो हमारे 140 करोड़ से अधिक नागरिकों के लिए प्रतिदिन भोजन की थाली सुनिश्चित करती है। यह केवल खाद्यान्न ही पैदा नहीं करती, बल्कि देश के बड़े-बड़े उद्योगों जैसे सूती वस्त्र उद्योग, चीनी मिलों और जूट कारखानों के लिए अत्यंत आवश्यक कच्चा माल भी उपलब्ध कराती है। इसके अतिरिक्त, भारतीय चाय, बेहतरीन कॉफी और हमारे तीखे मसालों की पूरी दुनिया में भारी माँग है, जिनके निर्यात से भारत को एक बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। समय के साथ, तकनीकी विकास और पर्यावरण में बदलाव के कारण भारत में खेती करने के तौर-तरीकों में भी व्यापक परिवर्तन आए हैं। आइए, इस भाग में हम भारत की विभिन्न कृषि प्रणालियों का गहराई से विश्लेषण करें।
भारत में कृषि प्रणालियाँ और उनके प्रकार
भौगोलिक विविधता, अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों और सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण हमारे देश में खेती करने के कई अलग-अलग तरीके विकसित हुए हैं। वर्तमान समय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मुख्य रूप से निम्नलिखित कृषि प्रणालियाँ अपनाई जा रही हैं:
प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि
जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह खेती का सबसे पुराना और आदिम तरीका है जो आज भी भारत के कुछ दुर्गम पहाड़ी और आदिवासी इलाकों में जीवित है। इस प्रणाली में किसान ज़मीन के बहुत छोटे टुकड़ों पर खेती करते हैं। इस कृषि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें आज भी आधुनिक मशीनों के बजाय लकड़ी के हल, डाओ और खुदाई करने वाली साधारण छड़ियों का ही प्रयोग किया जाता है। पूरा परिवार या स्थानीय समुदाय मिलकर खेतों में शारीरिक श्रम करता है। यह खेती पूरी तरह से मानसून की बारिश और मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता (उपजाऊपन) पर निर्भर होती है। इसमें किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं किया जाता।
इस प्रणाली को कर्तन दहन प्रणाली (Slash and Burn Agriculture) के नाम से भी जाना जाता है। इसमें किसान जंगल के एक हिस्से को चुनकर वहाँ के पेड़ों और झाड़ियों को काट देते हैं और फिर उन्हें जलाकर ज़मीन को साफ कर लेते हैं। जली हुई राख मिट्टी में मिल जाती है जिससे ज़मीन उपजाऊ हो जाती है। जब कुछ वर्षों बाद उस ज़मीन की पैदावार कम होने लगती है, तो किसान उस जगह को छोड़कर जंगल के किसी दूसरे हिस्से में चले जाते हैं और यही प्रक्रिया दोहराते हैं। इस स्थानांतरण से पुरानी ज़मीन को खाली समय मिल जाता है और प्रकृति स्वयं ही उसकी उर्वरता को दोबारा लौटा देती है।
इस अद्भुत कृषि प्रणाली को भारत के अलग-अलग राज्यों में विभिन्न स्थानीय नामों से पुकारा जाता है:
- उत्तर-पूर्वी राज्यों में (असम, मेघालय, मिजोरम और नागालैंड): इसे ‘झूम’ या झूमिंग कृषि कहा जाता है।
- मणिपुर में: इसे ‘पामलू’ के नाम से जाना जाता है।
- छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में: इसे ‘दीपा’ कहते हैं।
- मध्य प्रदेश में: इसे ‘बेबर’ या ‘दहिया’ कहा जाता है।
- आंध्र प्रदेश में: इसे ‘पोडु’ अथवा ‘पेंडा’ नाम दिया गया है।
- ओडिशा में: इसे ‘पामाडाबी’, ‘कोमान’ या ‘बरीगाँ’ पुकारते हैं।
- पश्चिमी घाट के क्षेत्रों में: इसे ‘कुमारी’ कहा जाता है।
- दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में: इसे ‘वालरे’ या ‘वाल्टरे’ कहते हैं।
- हिमालयन क्षेत्र में: इसे ‘खिल’ और झारखंड में ‘कुरुवा’ कहा जाता है।
गहन जीविका कृषि
यह प्रणाली भारत के उन मैदानी और उपजाऊ क्षेत्रों में अपनाई जाती है जहाँ भूमि तो कम है, लेकिन उस पर निवास करने वाली जनसंख्या का दबाव बहुत अधिक है। हमारे देश में पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज़मीन का बँटवारा होता रहता है, जिससे किसानों के खेतों का आकार (जोत) बहुत छोटा और आर्थिक रूप से अलाभप्रद हो गया है। रोज़गार के अन्य साधनों की कमी के कारण किसान उसी छोटे से खेत से अपने परिवार का पेट पालने की कोशिश करते हैं।
चूँकि ज़मीन कम है और उत्पादन ज़्यादा चाहिए, इसलिए किसान इस खेती में बहुत अधिक श्रम (मेहनत) करते हैं। वे फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए भारी मात्रा में जैव-रासायनिक उर्वरकों (Chemical Fertilizers), कीटनाशकों और कृत्रिम सिंचाई के साधनों (ट्यूबवेल आदि) का अत्यधिक प्रयोग करते हैं। इस कारण कृषि भूमि पर बहुत अधिक दबाव पड़ता है और ज़मीन को कभी खाली नहीं छोड़ा जाता।
वाणिज्यिक कृषि
यह आधुनिक भारत की वह कृषि प्रणाली है जिसका मुख्य लक्ष्य फसल को बाज़ार में बेचकर अधिक से अधिक मुनाफा कमाना होता है। इस कृषि में आधुनिक निवेशों का भरपूर इस्तेमाल होता है। किसान अधिक पैदावार देने वाले संकर बीजों (HYV Seeds), उन्नत रासायनिक खादों, कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों का प्रयोग करते हैं ताकि उत्पादन का स्तर बहुत ऊँचा रहे। खेतों में ट्रैक्टर, हार्वेस्टर जैसी बड़ी मशीनों का प्रयोग आम बात है।
एक बहुत ही रोचक तथ्य यह है कि कृषि के वाणिज्यीकरण का स्तर हर राज्य में अलग-अलग है। जो फसल एक राज्य में व्यापार के लिए उगाई जाती है, वही फसल दूसरे राज्य में केवल परिवार के भरण-पोषण के लिए बोई जा सकती है। उदाहरण के तौर पर, हरियाणा और पंजाब में ‘चावल’ मुख्य रूप से एक वाणिज्यिक फसल है जिसे बाज़ार में बेचा जाता है, लेकिन ओडिशा में चावल एक जीविका फसल है जिसे किसान खुद खाने के लिए उगाते हैं।
रोपण कृषि
रोपण कृषि भी वाणिज्यिक खेती का ही एक बहुत विशाल और व्यापक रूप है। इसमें किसी एक ही प्रकार की फसल को बहुत लंबे-चौड़े और विस्तृत क्षेत्र में लगाया जाता है। इसे आप कृषि और बड़े उद्योगों के बीच की एक कड़ी (Interface) मान सकते हैं। रोपण कृषि में अत्यधिक पूँजी (पैसा) और बहुत बड़ी संख्या में कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है। इससे मिलने वाला सारा उत्पादन सीधे उद्योगों में कच्चे माल के रूप में भेज दिया जाता है।
भारत में चाय, कॉफी, रबर, गन्ना, और केला रोपण कृषि की प्रमुख फसलें हैं। उदाहरण के लिए, असम और उत्तरी बंगाल के विस्तृत बागानों में चाय की खेती होती है, जबकि कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में कॉफी और रबर की खेती मुख्य रूप से की जाती है। चूँकि इस कृषि का पूरा माल बाज़ार में बिकने जाता है, इसलिए इन बागानों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए एक बेहतरीन परिवहन नेटवर्क (सड़कें और रेलवे) और संचार व्यवस्था का होना अत्यंत आवश्यक है।
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