कक्षा 10 भूगोल के इस नए भाग में आपका स्वागत है। भारत एक अत्यंत विशाल और अद्भुत देश है जहाँ मिट्टी की बनावट, जलवायु की दशाओं और सदियों पुरानी कृषि पद्धतियों में बहुत गहरी विविधता देखने को मिलती है। इसी भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता के परिणामस्वरूप हमारे देश के अलग-अलग कोनों में अनेक प्रकार की खाद्य (खाने योग्य) और अखाद्य (व्यावसायिक) फसलें उगाई जाती हैं। भारत में उगाई जाने वाली मुख्य फसलों को हम मोटे तौर पर खाद्यान्न (जैसे चावल, गेहूँ, मोटे अनाज और दालें) और नकदी या व्यावसायिक फसलों (जैसे गन्ना, तिलहन, चाय, कॉफी) में बाँट सकते हैं। ये फसलें केवल हमारी 140 करोड़ से अधिक आबादी की भूख ही नहीं मिटातीं, बल्कि ये हमारे ग्रामीण समाज की रीढ़ हैं और बड़े उद्योगों को कच्चा माल भी प्रदान करती हैं। आइए, इस भाग में हम भारत की प्रमुख फसलों के लिए आवश्यक भौगोलिक परिस्थितियों और उनके प्रमुख उत्पादक राज्यों का बहुत ही गहराई से और तार्किक रूप से अध्ययन करें।
भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसलें
खाद्यान्न फसलें मुख्य रूप से वे फसलें होती हैं जिनका उपयोग हम अपने दैनिक भोजन के लिए करते हैं। भारत के कुल कृषि उत्पादन और बोए गए क्षेत्र में खाद्यान्नों का हिस्सा सबसे अधिक है।
1. चावल (Rice)
चावल भारत के बहुसंख्यक लोगों (विशेषकर पूर्वी, उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी भारत) का सबसे मुख्य और प्रिय भोजन है। क्या आप जानते हैं कि चीन के बाद भारत पूरी दुनिया में चावल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है? चावल मुख्य रूप से एक खरीफ की फसल है जिसे उगाने के लिए विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों की सख्त आवश्यकता होती है। इसके पौधे को पनपने के लिए उच्च तापमान (लगभग 25°C से ऊपर) और अत्यधिक नमी (आर्द्रता) की ज़रूरत होती है। चावल की बेहतरीन खेती के लिए 100 सेंटीमीटर से अधिक वार्षिक वर्षा का होना बहुत ज़रूरी माना जाता है।
भारत में चावल प्राकृतिक रूप से उत्तर और उत्तर-पूर्वी मैदानों, तटीय क्षेत्रों और डेल्टाई प्रदेशों में बहुतायत से उगाया जाता है। परंतु आधुनिक समय में, जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है (जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्से), वहाँ भी नहरों के घने जाल और नलकूपों (ट्यूबवेल) की मदद से कृत्रिम सिंचाई करके चावल की बंपर पैदावार की जा रही है।
2. गेहूँ (Wheat)
गेहूँ भारत की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण और प्रमुख खाद्यान्न फसल है। उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत में रहने वाले करोड़ों लोगों के दिन की शुरुआत गेहूँ की रोटी से ही होती है। यह एक रबी की फसल है, जिसे सर्दियों के मौसम में बोया जाता है। इसे उगने के लिए ठंडी जलवायु और पकने के समय खिली हुई तेज़ धूप की आवश्यकता होती है। गेहूँ की अच्छी पैदावार के लिए 50 से 75 सेंटीमीटर की समान रूप से वितरित वार्षिक वर्षा आदर्श मानी जाती है।
भारत में गेहूँ उगाने वाले दो मुख्य क्षेत्र हैं: पहला उत्तर-पश्चिम में गंगा-सतलुज का उपजाऊ मैदान और दूसरा दक्कन का काली मिट्टी वाला क्षेत्र। हमारे देश में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान गेहूँ के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। हरित क्रांति की अपार सफलता का सबसे बड़ा श्रेय गेहूँ के उत्पादन में हुई अभूतपूर्व वृद्धि को ही जाता है।
3. मोटे अनाज (Millets)
हमारे देश में मुख्य रूप से ज्वार, बाजरा और रागी उगाए जाते हैं। यद्यपि इन्हें आम बोलचाल में ‘मोटा अनाज’ कहा जाता है, लेकिन अगर हम पोषण की बात करें तो इनमें मौजूद पोषक तत्वों की मात्रा बेजोड़ होती है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण आज शहरी क्षेत्रों में भी इनकी माँग तेज़ी से बढ़ रही है।
- ज्वार: क्षेत्रफल और उत्पादन की दृष्टि से ज्वार देश की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। यह मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर फसल है और नमी वाले क्षेत्रों में उगाई जाती है, जिसके कारण इसे अलग से सिंचाई की बहुत कम आवश्यकता होती है। महाराष्ट्र देश का सबसे बड़ा ज्वार उत्पादक राज्य है, जिसके बाद कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश का स्थान आता है।
- बाजरा: यह रेतीली और उथली काली मिट्टी पर बहुत अच्छी तरह से उगता है। राजस्थान भारत का सबसे बड़ा बाजरा उत्पादक राज्य है, जहाँ की शुष्क जलवायु और बलुई मिट्टी इसके लिए बहुत अनुकूल है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा भी इसके प्रमुख उत्पादक हैं।
- रागी: यह पूरी तरह से शुष्क प्रदेशों (सूखे इलाकों) की फसल है और लाल, काली, बलुई और दोमट मिट्टी पर आसानी से उग जाती है। रागी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें लोहा, कैल्शियम और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व बहुत ही भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। कर्नाटक रागी का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है।
4. मक्का (Maize)
मक्का एक अत्यंत विशेष और बहुपयोगी फसल है जिसका उपयोग मनुष्य के भोजन और पशुओं के चारे, दोनों के रूप में बड़े पैमाने पर किया जाता है। यह मूल रूप से एक खरीफ फसल है जिसे उगने के लिए 21°C से 27°C के बीच तापमान और पुरानी जलोढ़ मिट्टी की आवश्यकता होती है। हालाँकि, बिहार जैसे कुछ राज्यों में जलवायु अनुकूल होने के कारण मक्का रबी की ऋतु में भी उगाया जाता है। आधुनिक तकनीकी निवेशों जैसे उच्च पैदावार देने वाले बीजों (HYV), रासायनिक खादों और सिंचाई के साधनों के उपयोग से मक्के के उत्पादन में भारी इज़ाफ़ा हुआ है। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना इसके मुख्य उत्पादक हैं।
5. दालें (Pulses)
भारत पूरे विश्व में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक होने के साथ-साथ सबसे बड़ा उपभोक्ता (इस्तेमाल करने वाला) भी है। भारत जैसे विशाल देश में जहाँ शाकाहारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा निवास करता है, वहाँ दालें प्रोटीन का सबसे मुख्य स्रोत होती हैं। भारत में उगाई जाने वाली प्रमुख दालें अरहर (तुर), उड़द, मूँग, मसूर, मटर और चना हैं।
दालों की खेती के लिए बहुत कम नमी की आवश्यकता होती है और ये शुष्क परिस्थितियों में भी आसानी से पनप सकती हैं। अरहर की दाल को छोड़कर, अन्य सभी दालें फलीदार (Leguminous) फसलें हैं। इन फलीदार फसलों की जड़ों में ऐसे विशेष जीवाणु पाए जाते हैं जो हवा से नाइट्रोजन ग्रहण करके भूमि की प्राकृतिक उर्वरता को वापस लौटा देते हैं। यही कारण है कि दालों को प्रायः अन्य फसलों के साथ आवर्तन (फसल चक्र) में बोया जाता है ताकि ज़मीन बंजर न हो। मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक दालों के मुख्य उत्पादक हैं।
प्रमुख नकदी फसलें (Cash and Commercial Crops)
नकदी फसलें वे होती हैं जिन्हें किसान मुख्य रूप से बाज़ार में बेचकर मुनाफा कमाने और बड़े उद्योगों को कच्चा माल प्रदान करने के लिए उगाता है।
1. गन्ना (Sugarcane)
गन्ना एक बहुत ही महत्वपूर्ण उष्ण और उपोष्ण कटिबंधीय नकदी फसल है। इसे पनपने के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु की सख्त आवश्यकता होती है, जहाँ का तापमान 21°C से 27°C के बीच हो और जहाँ 75 सेंटीमीटर से 100 सेंटीमीटर तक बारिश होती हो। गन्ने की खेती में बुवाई से लेकर कटाई तक बहुत भारी शारीरिक श्रम (मेहनत) की आवश्यकता होती है। पूरी दुनिया में ब्राज़ील के बाद भारत गन्ने का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। गन्ने का उपयोग कारखानों में चीनी, गुड़, खांडसारी और शीरा (Molasses) बनाने में किया जाता है। उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य है, इसके बाद महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, पंजाब और हरियाणा का नंबर आता है।
2. तिलहन (Oilseeds)
भारत में उगाई जाने वाली विभिन्न तिलहन फसलें देश के कुल बोए गए क्षेत्र के लगभग 12 प्रतिशत भाग पर फैली हुई हैं। तिलहन वे फसलें होती हैं जिनसे तेल निकाला जाता है। मुख्य तिलहनों में मूँगफली, सरसों, नारियल, तिल, सोयाबीन, अरंडी, बिनौला (कपास के बीज), अलसी और सूरजमुखी शामिल हैं। इनमें से ज़्यादातर तिलहन खाद्य (खाने योग्य) हैं और भोजन पकाने में इनका इस्तेमाल होता है। इसके अलावा तिलहन के बीजों का उपयोग साबुन, सौंदर्य प्रसाधन (Cosmetics) और मलहम बनाने वाले उद्योगों में कच्चे माल के रूप में भी भारी मात्रा में होता है।
मूँगफली: यह तिलहन उत्पादन में सबसे महत्वपूर्ण फसल है और यह एक खरीफ की फसल है। देश के कुल तिलहन उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा अकेले मूँगफली से ही प्राप्त होता है। गुजरात मूँगफली का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। अलसी और सरसों रबी की फसलें हैं। तिल उत्तर भारत में खरीफ और दक्षिण भारत में रबी की फसल है, जबकि अरंडी (Castor) की खेती खरीफ और रबी दोनों मौसमों में की जाती है।
3. चाय और कॉफी (Tea and Coffee)
चाय की खेती रोपण कृषि का एक बहुत ही शानदार उदाहरण है। यह एक महत्वपूर्ण पेय पदार्थ है जिसकी शुरुआत अंग्रेजों ने भारत में की थी। चाय के पौधे उष्ण और उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु, ह्यूमस और जीवांश युक्त गहरी तथा सुगम जल निकास वाली ढलवाँ मिट्टी में बहुत अच्छी तरह से उगते हैं। इसके लिए वर्ष भर कोष्ण, नम और पाला रहित जलवायु की आवश्यकता होती है। असम, पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग), तमिलनाडु और केरल इसके प्रमुख उत्पादक हैं।
इसी प्रकार, भारतीय कॉफी पूरी दुनिया में अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के लिए जानी जाती है। भारत में यमन से लाई गई ‘अरेबिका’ किस्म की कॉफी पैदा की जाती है। इसकी शुरुआत बाबा बूदन की पहाड़ियों से हुई थी और आज भी इसकी खेती नीलगिरि की पहाड़ियों के आस-पास कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में की जाती है।
क्विज़ खेलें और अपनी तैयारी जांचें
Total Slides: 7
Total Questions: 20 | Total Marks: 32
Leaderboard (Last 30 Days)
महत्वपूर्ण लिंक
- अध्याय 4: कृषि (Agriculture) – सम्पूर्ण व्याख्या
- भाग 1: कृषि के प्रकार और प्रमुख शस्य ऋतुएँ
- You are Reading Here: भाग 2: प्रमुख खाद्यान्न और नकदी फसलें
- भाग 3: अखाद्य फसलें, तकनीकी सुधार और भूदान आंदोलन