ऊर्जा संसाधन: परंपरागत स्रोत विषय उत्तर प्रदेश बोर्ड कक्षा 10 के पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण भाग है। इसमें हम उन ऊर्जा स्रोतों का अध्ययन करेंगे जो प्रकृति में सीमित मात्रा में पाए जाते हैं और जिनका उपयोग मानव सभ्यता प्राचीन काल से करती आ रही है। ये स्रोत अनवीकरणीय हैं, जैसे कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस तथा परमाणु ऊर्जा। इनके अत्यधिक दोहन से ऊर्जा संकट उत्पन्न हो सकता है, इसलिए इनके विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता है।
कल्पना कीजिए, आपके घर में खाना पकाने के लिए एलपीजी गैस का सिलेंडर खत्म हो गया है और बाजार बंद है। ऐसे में आपकी दादी माँ लकड़ी या उपलों से चूल्हा जलाकर खाना बनाती हैं। यही लकड़ी और उपले पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के उदाहरण हैं जो सदियों से हमारे जीवन का हिस्सा रहे हैं। आधुनिक जीवन में हम इनके साथ कोयला, पेट्रोल, डीजल और बिजली पर भी निर्भर हैं। आइए इन्हीं स्रोतों को विस्तार से समझें।
परंपरागत ऊर्जा स्रोतों का वर्गीकरण
परंपरागत ऊर्जा स्रोत मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं: जैव मात्रा (लकड़ी, उपले) तथा जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस)। इसके अतिरिक्त खनिज आधारित ऊर्जा स्रोतों में परमाणु ऊर्जा भी शामिल है। ये सभी अनवीकरणीय हैं, जिनके भंडार सीमित हैं।
कोयला
भारत में कोयला सबसे प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला जीवाश्म ईंधन है। इसका निर्माण लाखों वर्ष पूर्व वनस्पति के दबकर कोयले में बदलने से हुआ। कार्बन की मात्रा के आधार पर कोयला चार प्रकार का होता है:
- पीट: इसमें कार्बन की मात्रा सबसे कम (लगभग 30-40%) तथा नमी अधिक होती है। यह निम्न कोटि का ईंधन है।
- लिग्नाइट: यह भूरे रंग का निम्न कोटि का कोयला है जिसमें कार्बन 40-55% तक होता है।
- बिटुमिनस: इसमें कार्बन 60-80% होता है और यह सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला कोयला है।
- एंथ्रासाइट: यह सर्वोत्तम कोटि का कठोर कोयला है जिसमें कार्बन 90% से अधिक होता है।
भारत में कोयले के निक्षेप
भारत में कोयला मुख्यतः दो कालों का पाया जाता है:
- गोंडवाना कोयला: यह लगभग 200 मिलियन वर्ष पुराना है। इसका विस्तार मुख्यतः दामोदर घाटी (झारखंड, पश्चिम बंगाल) तथा गोदावरी, महानदी और सोन घाटियों में है। यह भारत के कुल कोयला उत्पादन का लगभग 98% है।
- टर्शियरी कोयला: यह लगभग 55 मिलियन वर्ष पुराना है और मुख्यतः पूर्वोत्तर राज्यों (असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड) में पाया जाता है।
पेट्रोलियम
पेट्रोलियम या खनिज तेल एक तरल जीवाश्म ईंधन है जो समुद्री जीवों के अवशेषों से बना। भारत में इसके प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं:
- मुंबई हाई: अरब सागर में स्थित यह भारत का सबसे बड़ा अपतटीय तेल क्षेत्र है।
- गुजरात: खम्भात की खाड़ी तथा अंकलेश्वर में तेल के कुएँ हैं।
- असम: डिगबोई (एशिया की सबसे पुरानी तेल रिफायनरी) तथा नहरकटिया प्रमुख क्षेत्र हैं।
पेट्रोलियम से पेट्रोल, डीजल, मिट्टी का तेल, एलपीजी आदि प्राप्त होते हैं।
प्राकृतिक गैस
प्राकृतिक गैस मुख्यतः मीथेन का मिश्रण है और पेट्रोलियम के साथ या स्वतंत्र रूप में पाई जाती है। इसका उपयोग उर्वरक निर्माण, बिजली उत्पादन तथा रसोई ईंधन के रूप में होता है। भारत में गैस ग्रिड के विकास के लिए एचवीजे पाइपलाइन (हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर) अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह 1700 किमी लंबी पाइपलाइन है, जबकि वर्तमान में देश में 18500 किमी से अधिक पाइपलाइनों का जाल बिछाया जा चुका है।
विद्युत ऊर्जा
विद्युत परंपरागत ऊर्जा का सबसे आधुनिक रूप है। इसका उत्पादन तीन मुख्य विधियों से होता है:
- जल विद्युत: बहते पानी से टरबाइन चलाकर। प्रमुख बहूद्देशीय परियोजनाएँ हैं: भाखड़ा नांगल, दामोदर घाटी, हीराकुंड, कोपिली आदि।
- ताप विद्युत: कोयला, तेल या गैस जलाकर भाप से टरबाइन चलाई जाती है। भारत में 70% से अधिक बिजली ताप विद्युत से प्राप्त होती है।
- परमाणु विद्युत: यूरेनियम तथा थोरियम के नाभिकीय विखंडन से ऊर्जा प्राप्त कर।
परमाणु ऊर्जा
परमाणु ऊर्जा अनवीकरणीय स्रोत है जिसमें भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। भारत में यूरेनियम के भंडार झारखंड (जादूगुड़ा) तथा राजस्थान में हैं, जबकि थोरियम केरल की मोनाजाइट रेत में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। प्रमुख परमाणु ऊर्जा संयंत्र तारापुर (महाराष्ट्र), रावतभाटा (राजस्थान), कुडनकुलम (तमिलनाडु), नरौरा (उत्तर प्रदेश) आदि हैं।
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अध्याय के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: खनिज: परिचय एवं महत्व
- भाग 2: खनिजों का वर्गीकरण तथा शैल समूहों में उपलब्धता
- भाग 3: भारत में प्रमुख खनिजों का वितरण (धात्विक एवं अधात्विक)
- भाग 4: खनन के प्रभाव एवं खनिज संरक्षण
- You are Reading Here: ऊर्जा संसाधन: परंपरागत स्रोत
- भाग 6: ऊर्जा संसाधन: गैर-परंपरागत स्रोत एवं संरक्षण