कक्षा 10 भूगोल (Geography) के पहले अध्याय ‘संसाधन एवं विकास’ (Resources and Development) के इस भाग में हम संसाधनों के अर्थ और उनके वर्गीकरण का विस्तार से अध्ययन करेंगे। यूपी बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से संसाधनों की परिभाषा और उत्पत्ति, समाप्यता, स्वामित्व तथा विकास के स्तर के आधार पर उनका वर्गीकरण बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है, जिससे अक्सर बहुविकल्पीय और लघु उत्तरीय प्रश्न पूछे जाते हैं। साथ ही, हम जानेंगे कि कोई भी वस्तु संसाधन कैसे बनती है और मनुष्य की भूमिका इसमें कितनी अहम है।
अब सबसे पहले इस टॉपिक पर एक तेज़ क्विज़ खेलते हैं। क्विज़ से पहले एक ज्ञान स्लाइड दिखेगी—उसे पूरा पढ़ लो, फिर सवालों के जवाब दो। नवीकरण और अनवीकरण संसाधनों के अंतर, जैव-अजैव संसाधनों की पहचान और स्वामित्व वाले वर्गीकरण पर ध्यान ज़रूर देना।
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संसाधन (Resources) किसे कहते हैं?
हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं (ज़रूरतों) को पूरा करने में प्रयोग की जा सकती है, उसे संसाधन कहते हैं। लेकिन किसी भी वस्तु को संसाधन कहलाने के लिए तीन शर्तों का पूरा होना ज़रूरी है:
- प्रौद्योगिकी (Technology) उपलब्ध हो: उस वस्तु को इस्तेमाल करने की तकनीक हमारे पास होनी चाहिए।
- आर्थिक रूप से संभाव्य हो: उसे निकालने या इस्तेमाल करने में आने वाला खर्च हमारी पहुँच में हो।
- सांस्कृतिक रूप से मान्य हो: समाज उस वस्तु के इस्तेमाल को स्वीकार करता हो।
मनुष्य प्रकृति (भौतिक पर्यावरण), प्रौद्योगिकी और संस्थाओं के साथ परस्पर क्रिया करके ही संसाधनों का निर्माण करता है। इसलिए मानव स्वयं भी एक बहुत महत्वपूर्ण संसाधन है। समय के साथ, तकनीकी विकास और सामाजिक बदलाव से कोई भी प्राकृतिक पदार्थ संसाधन बन सकता है; जैसे कभी यूरेनियम केवल एक खनिज था, लेकिन आज वह ऊर्जा का एक बड़ा स्रोत है।
संसाधनों का वर्गीकरण
संसाधनों को अध्ययन की सुविधा के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित आधारों पर वर्गीकृत (बाँटा) किया गया है:
1. उत्पत्ति के आधार पर
- जैव संसाधन (Biotic Resources): इन संसाधनों की प्राप्ति जीवमंडल से होती है और इनमें जीवन (जान) होता है। उदाहरण: मनुष्य, वनस्पति (पेड़-पौधे), और वन्य जीव। कृषि से मिलने वाले अनाज, दूध, माँस आदि भी इसी श्रेणी में आते हैं।
- अजैव संसाधन (Abiotic Resources): वे सभी संसाधन जो निर्जीव वस्तुओं से बने हैं, अजैव संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण: चट्टानें, धातुएँ और खनिज। मृदा, जल और वायु भी अजैव संसाधन हैं, जो कृषि और उद्योगों के लिए आवश्यक हैं।
2. समाप्यता के आधार पर
- नवीकरण योग्य संसाधन (Renewable): वे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा दोबारा बनाया जा सकता है। उदाहरण: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल और वन। हालाँकि, कुछ नवीकरणीय संसाधन जैसे भूमिगत जल का अति-दोहन होने पर उसे पुनर्भरित होने में समय लगता है, इसलिए सावधानी ज़रूरी है।
- अनवीकरण योग्य संसाधन (Non-Renewable): इन संसाधनों के बनने में लाखों वर्ष लग जाते हैं। एक बार प्रयोग करने के बाद ये खत्म हो जाते हैं। उदाहरण: कोयला, पेट्रोल और अन्य जीवाश्म ईंधन। इनके सीमित भंडार और बढ़ती माँग ने पूरी दुनिया को ऊर्जा संकट की ओर धकेल दिया है, इसलिए इनका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है।
3. स्वामित्व के आधार पर
- व्यक्तिगत संसाधन: जो संसाधन निजी व्यक्तियों के स्वामित्व (कब्ज़े) में होते हैं। जैसे- किसानों की ज़मीन, लोगों के अपने घर और कुएँ।
- सामुदायिक संसाधन: ये संसाधन समुदाय के सभी सदस्यों के लिए उपलब्ध होते हैं। जैसे- गाँव की चरागाह भूमि, श्मशान भूमि, और शहरों के पार्क। ये संसाधन सामूहिक भलाई के लिए होते हैं और इन पर सबका बराबर का अधिकार माना जाता है।
- राष्ट्रीय संसाधन: तकनीकी तौर पर देश में पाए जाने वाले सारे संसाधन राष्ट्रीय होते हैं। देश की सरकार को अधिकार है कि वह जनहित में किसी की भी ज़मीन अधिग्रहित कर सकती है। सड़कें, रेलवे, खनिज भंडार, और वन इसी के अंतर्गत आते हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय संसाधन: तट रेखा से 200 समुद्री मील की दूरी से परे खुले महासागर के संसाधनों पर किसी एक देश का अधिकार नहीं होता। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ इनकी निगरानी करती हैं। इन्हें ‘मानवता की साझी विरासत’ भी कहा जाता है।
4. विकास के स्तर के आधार पर
- संभावी (Potential): जो किसी प्रदेश में मौजूद तो हैं, लेकिन उनका उपयोग नहीं किया गया है। जैसे- राजस्थान और गुजरात में पवन और सौर ऊर्जा।
- विकसित (Developed): वे संसाधन जिनका सर्वेक्षण हो चुका है और उपयोग की मात्रा तय हो चुकी है। इनका दोहन किया जा रहा है, जैसे नर्मदा घाटी में जल विद्युत संयंत्र।
- भंडार (Stock): पर्यावरण में मौजूद वे पदार्थ जो मानव की ज़रूरतें पूरी कर सकते हैं, लेकिन ‘उपयुक्त तकनीक’ न होने के कारण हमारी पहुँच से बाहर हैं। जैसे- जल (H2O) से ऊर्जा निकालना।
- संचित कोष (Reserves): यह भंडार का ही हिस्सा है। इन्हें उपलब्ध तकनीक से प्रयोग में लाया जा सकता है, लेकिन अभी इनका उपयोग शुरू नहीं हुआ है, इन्हें भविष्य के लिए बचाकर रखा गया है (जैसे- बाँधों का जल)।
अध्याय 1 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- मुख्य पृष्ठ: संसाधन एवं विकास – सम्पूर्ण अध्याय
- You are Reading Here: संसाधन: प्रकार और वर्गीकरण
- भाग 2: संसाधनों का विकास और सतत् पोषणीय विकास
- भाग 3: भारत में संसाधन नियोजन और भू-संसाधन
- भाग 4: मृदा संसाधन: जलोढ़, काली और लाल मृदा
- भाग 5: मृदा अपरदन, भूमि निम्नीकरण और संरक्षण
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