कक्षा 10 भूगोल के अध्याय ‘संसाधन एवं विकास’ के इस अंतिम भाग में हम ‘मृदा अपरदन’ और उसे रोकने के विभिन्न उपायों का अध्ययन करेंगे। यूपी बोर्ड परीक्षा में “उत्खात भूमि किसे कहते हैं?”, “समोच्च जुताई क्या है?” और “मृदा संरक्षण के उपाय” जैसे प्रश्न अति-लघु और दीर्घ उत्तरीय दोनों ही खंडों में अक्सर पूछे जाते हैं। आइए, मिट्टी के कटाव और उसके बचाव के तरीकों को आसान भाषा में समझें।
मृदा अपरदन क्या है?
मृदा (मिट्टी) के कटाव और उसके पानी या हवा के साथ बह जाने की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहा जाता है। आमतौर पर मिट्टी के बनने और उसके अपरदन (कटाव) की क्रियाएँ साथ-साथ चलती हैं और दोनों में एक प्राकृतिक संतुलन होता है। लेकिन मानवीय क्रियाओं जैसे—वनोन्मूलन (पेड़ों की कटाई), अति पशुचारण, निर्माण कार्यों और खनन से यह संतुलन बिगड़ जाता है। इसके अलावा पवन, हिमनदी और जल जैसे प्राकृतिक तत्त्व भी मृदा अपरदन करते हैं।
अवनलिकाएँ और उत्खात भूमि
जब तेजी से बहता हुआ जल चिकनी (मृत्तिकायुक्त) मिट्टी को काटता है, तो वह गहरी नालियाँ या वाहिकाएँ बना देता है, जिन्हें अवनलिकाएँ कहते हैं। अवनलिकाओं के कारण वह भूमि जोतने या खेती करने योग्य नहीं रह जाती। ऐसी खराब ज़मीन को उत्खात भूमि कहा जाता है। चंबल नदी के बेसिन में ऐसी खराब भूमि बहुत ज्यादा पाई जाती है, जिसे वहाँ ‘खड्ड भूमि’ कहा जाता है।
चादर अपरदन और पवन अपरदन
कई बार पानी एक विस्तृत और ढाल वाले क्षेत्र को ढकता हुआ नीचे की ओर बहता है। इस स्थिति में उस पूरे क्षेत्र की ऊपरी मिट्टी पानी में घुलकर बह जाती है। इस प्रक्रिया को चादर अपरदन कहा जाता है। वहीं दूसरी ओर, जब तेज हवा (पवन) द्वारा मैदानी या ढालू क्षेत्र से सूखी मिट्टी को उड़ा ले जाया जाता है, तो उसे पवन अपरदन कहा जाता है। गलत ढंग से खेती करने (जैसे ढाल पर ऊपर से नीचे हल चलाने) से भी मिट्टी का कटाव तेजी से होता है।
मृदा संरक्षण के प्रमुख उपाय
मिट्टी के कटाव को रोकने और उसे बचाने की प्रक्रिया को ‘मृदा संरक्षण’ कहते हैं। पहाड़ी और ढाल वाले क्षेत्रों में मृदा संरक्षण के लिए निम्नलिखित महत्वपूर्ण तरीके अपनाए जाते हैं:
समोच्च जुताई
ढाल वाली भूमि पर समोच्च रेखाओं के बिल्कुल समानांतर हल चलाने से ढाल के साथ पानी के बहने की गति कम हो जाती है। खेती के इस तरीके को समोच्च जुताई कहा जाता है।
सोपान अथवा सीढ़ीदार कृषि
ढाल वाली ज़मीन पर सीढ़ियाँ या सोपान बनाकर खेती की जाती है। यह तरीका पानी के तेज़ बहाव और अपरदन को नियंत्रित करता है। पश्चिमी और मध्य हिमालय के क्षेत्रों में सोपान कृषि (सीढ़ीदार खेती) बहुत अधिक विकसित है।
पट्टी कृषि
बड़े खेतों को अलग-अलग पट्टियों में बाँट दिया जाता है और मुख्य फसलों के बीच में घास की पट्टियाँ उगाई जाती हैं। ये घास की पट्टियाँ हवा की ताक़त को कमज़ोर कर देती हैं, जिससे मिट्टी उड़ नहीं पाती। इस तरीके को पट्टी कृषि कहते हैं।
रक्षक मेखला बनाना
खेतों के किनारे या रेतीले इलाकों में पेड़ों को कतारों (लाइनों) में लगाकर एक रक्षक पट्टी या रक्षक मेखला बनाई जाती है। यह पेड़ों की कतार हवा की गति को कम करती है। पश्चिम भारत के मरुस्थलों में रेत के टीलों को उड़ने से रोकने (स्थायीकरण) में इन रक्षक पट्टियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।
अब खेलें: मृदा अपरदन और संरक्षण क्विज़
नीचे दिए गए ‘Play Quiz’ बटन पर क्लिक करें और मृदा अपरदन, उत्खात भूमि, समोच्च जुताई और रक्षक मेखला पर आधारित इन 20 महत्वपूर्ण प्रश्नों का अभ्यास करें!
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अध्याय 1 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- मुख्य पृष्ठ: संसाधन एवं विकास – सम्पूर्ण अध्याय
- भाग 1: संसाधन: प्रकार और वर्गीकरण
- भाग 2: संसाधनों का विकास और सतत् पोषणीय विकास
- भाग 3: भारत में संसाधन नियोजन और भू-संसाधन
- भाग 4: मृदा संसाधन: जलोढ़, काली और लाल मृदा
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