पिछले भाग में हमने जाना था कि पारितंत्र में उत्पादक, उपभोक्ता और अपघटक एक-दूसरे के साथ मिलकर कैसे रहते हैं।
प्रकृति में हर जीव को जिंदा रहने के लिए ऊर्जा (भोजन) की जरूरत होती है। कोई पौधे खाता है, तो कोई दूसरे जानवरों का शिकार करता है। भोजन के लिए जीवों की इसी निर्भरता से प्रकृति में एक बहुत ही सुंदर व्यवस्था बनती है। आज के इस भाग में हम आहार श्रृंखला, ऊर्जा के प्रवाह और जैव-आवर्धन जैसे बहुत ही महत्वपूर्ण विषयों को विस्तार से समझेंगे!
आहार श्रृंखला और पोषी स्तर क्या हैं?
जीवों की वह श्रृंखला (कतार) जिसमें एक जीव दूसरे जीव को अपना भोजन बनाता है, आहार श्रृंखला (Food Chain) कहलाती है। उदाहरण के लिए: घास को हिरन खाता है, और हिरन को शेर खाता है (घास → हिरन → शेर)।
आहार श्रृंखला का प्रत्येक चरण या कड़ी एक पोषी स्तर (Trophic Level) बनाते हैं:
- प्रथम पोषी स्तर: उत्पादक (हरे पौधे) हमेशा पहले स्तर पर होते हैं, क्योंकि वे सूर्य से ऊर्जा लेकर भोजन बनाते हैं।
- द्वितीय पोषी स्तर: प्राथमिक उपभोक्ता (शाकाहारी जीव जैसे गाय, टिड्डा) दूसरे स्तर पर आते हैं।
- तृतीय पोषी स्तर: द्वितीयक उपभोक्ता (छोटे मांसाहारी जीव जैसे मेंढक) तीसरे स्तर पर आते हैं।
- चतुर्थ पोषी स्तर: तृतीयक उपभोक्ता (बड़े मांसाहारी जीव जैसे शेर, चील) चौथे स्तर पर आते हैं।
आहार जाल किसे कहते हैं?
प्रकृति में आहार श्रृंखलाएं हमेशा सीधी नहीं होती हैं। एक जीव कई प्रकार के जीवों को खा सकता है, और उसे भी कई अन्य जीव खा सकते हैं। इस प्रकार, बहुत सी आहार श्रृंखलाएं आपस में जुड़कर एक जटिल नेटवर्क (शाखाएं) बना लेती हैं। इसी नेटवर्क को आहार जाल (Food Web) कहा जाता है। आहार जाल प्रकृति को संतुलन और स्थिरता प्रदान करता है।
पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह कैसे होता है?
सभी जीवों को कार्य करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो उन्हें भोजन से मिलती है। पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह हमेशा एकदिशिक (एक ही दिशा में) होता है। सूर्य से जो ऊर्जा हरे पौधों में आती है, वह वापस सूर्य में नहीं जाती, और शाकाहारियों को दी गई ऊर्जा वापस पौधों में नहीं आती। यह हमेशा आगे की ओर ही बढ़ती है।
ऊर्जा स्थानांतरण का दस प्रतिशत नियम क्या है?
हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की कुल ऊर्जा का केवल 1% भाग ही ग्रहण करके उसे भोजन (रासायनिक ऊर्जा) में बदल पाते हैं। इसके बाद जब ऊर्जा एक पोषी स्तर से दूसरे पोषी स्तर (जैसे पौधे से हिरन) में जाती है, तो ऊर्जा का बहुत बड़ा हिस्सा पर्यावरण में ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाता है।
अगले पोषी स्तर तक केवल 10 प्रतिशत (10%) ऊर्जा ही पहुँच पाती है। इसे ही ऊर्जा का 10 प्रतिशत नियम कहते हैं। चूँकि हर स्तर पर ऊर्जा बहुत कम हो जाती है, इसलिए आहार श्रृंखला में सामान्यतः केवल 3 या 4 चरण ही होते हैं। इसके बाद ऊर्जा इतनी कम हो जाती है कि जीवों का जीवित रहना मुश्किल हो जाता है।
जैव आवर्धन क्या है और यह कैसे नुकसान पहुँचाता है?
फसलों को बीमारियों और कीड़ों से बचाने के लिए हम बहुत सारे कीटनाशकों (Pesticides) और रसायनों का उपयोग करते हैं। ये रसायन मिट्टी और पानी में मिल जाते हैं और वहाँ से पौधों में प्रवेश कर जाते हैं।
ये रसायन अजैव निम्नीकरणीय होते हैं (नष्ट नहीं होते), इसलिए जब शाकाहारी जीव पौधों को खाते हैं, तो ये रसायन उनके शरीर में जमा हो जाते हैं। जैसे-जैसे हम आहार श्रृंखला में ऊपर जाते हैं (पोषी स्तर बढ़ता है), इन रसायनों की मात्रा जीवों के शरीर में लगातार बढ़ती (एकत्रित होती) जाती है। इस घटना को जैव आवर्धन (Biological Magnification) कहते हैं। चूँकि मनुष्य आहार श्रृंखला में सबसे ऊपर है, इसलिए हमारे शरीर में इन खतरनाक रसायनों की मात्रा सबसे अधिक जमा हो जाती है!
अब खेलें: आहार श्रृंखला और ऊर्जा प्रवाह क्विज़
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अध्याय 13 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: पारितंत्र क्या है और इसके मुख्य घटक कौन से हैं?
- You are Reading Here: आहार श्रृंखला, आहार जाल और ऊर्जा का प्रवाह कैसे होता है?
- भाग 3: ओज़ोन परत का अपक्षय और कचरा प्रबंधन क्या है?