पिछले भाग में हमने जाना था कि माता-पिता के गुण उनके बच्चों में जाते हैं, जिसे आनुवंशिकता कहते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर पिता के बाल घुंघराले हैं और माता के बाल सीधे हैं, तो बच्चे के बाल कैसे होंगे? क्या दोनों के गुण आपस में मिलकर ‘हल्के घुंघराले’ बाल बन जाएंगे?
इस बहुत ही बड़े सवाल का जवाब खोजने के लिए आज से लगभग 150 साल पहले एक महान वैज्ञानिक ने कई सालों तक बगीचे में पौधों के साथ प्रयोग किए थे। उनका नाम था—ग्रेगर जॉन मेंडल। आज हम जानेंगे कि मेंडल ने क्या जादुई नियम खोजे और उन्होंने यह कैसे साबित किया कि माता-पिता के गुण आपस में ‘मिक्स’ नहीं होते!
ग्रेगर जॉन मेंडल कौन थे और उन्होंने मटर का पौधा ही क्यों चुना?
ग्रेगर जॉन मेंडल (1822-1884) एक गिरजाघर में पादरी थे, जिन्हें विज्ञान और गणित का बहुत गहरा ज्ञान था। उन्हें ‘आनुवंशिकी का जनक’ (Father of Genetics) कहा जाता है। अपने प्रयोगों के लिए उन्होंने बगीचे में उगने वाले मटर के पौधों का चुनाव किया।
मटर का पौधा चुनने का कारण यह था कि इसमें कई ऐसे ‘विपर्यासी (उल्टे) लक्षण’ पाए जाते थे जो बहुत ही साफ-साफ दिखाई देते थे। जैसे:
- पौधे या तो बहुत लंबे होते थे या बहुत बौने (छोटे)।
- बीज या तो बिल्कुल गोल होते थे या झुर्रीदार।
- फूलों का रंग या तो बैंगनी होता था या सफेद।
एक संकर क्रॉस: प्रभावी और अप्रभावी लक्षण क्या होते हैं?
मेंडल ने सबसे पहले केवल एक लक्षण (पौधे की लंबाई) को ध्यान में रखकर क्रॉस (संकरण) कराया। उन्होंने एक शुद्ध लंबे पौधे (TT) और एक शुद्ध बौने पौधे (tt) के बीच परागण कराया।
प्रथम पीढ़ी (F1) का परिणाम
मेंडल को लगा था कि लंबे और बौने पौधे के क्रॉस से शायद बीच की ऊँचाई (मध्यम आकार) के पौधे मिलेंगे। लेकिन जब पहली पीढ़ी (F1) के पौधे उगे, तो वे सभी के सभी लंबे थे! कोई भी पौधा बौना या बीच के आकार का नहीं था। इसका मतलब था कि दोनों लक्षणों में से केवल एक ही लक्षण अपने आप को दिखा पाया, दूसरा लक्षण छिप गया।
- प्रभावी लक्षण: वह ताकतवर लक्षण जो पहली पीढ़ी में बाहर से दिखाई देता है (जैसे यहाँ ‘लंबापन’), उसे प्रभावी लक्षण कहते हैं।
- अप्रभावी लक्षण: वह कमजोर लक्षण जो शरीर के अंदर मौजूद तो होता है, लेकिन छिप जाता है और दिखाई नहीं देता (जैसे यहाँ ‘बौनापन’), उसे अप्रभावी लक्षण कहते हैं।
द्वितीय पीढ़ी (F2) का परिणाम
इसके बाद मेंडल ने पहली पीढ़ी (F1) के लंबे पौधों (Tt) का आपस में ही परागण कराया। इस बार दूसरी पीढ़ी (F2) में एक बहुत ही चौंकाने वाला परिणाम मिला। इस बार सभी पौधे लंबे नहीं थे, बल्कि एक-चौथाई (25%) पौधे बौने पैदा हुए! इससे यह साबित हो गया कि बौनेपन का लक्षण F1 पीढ़ी में खत्म नहीं हुआ था, बल्कि वह बस ‘छिप’ गया था। F2 पीढ़ी में लंबे और बौने पौधों का अनुपात 3:1 प्राप्त हुआ।
द्वि-संकर क्रॉस: क्या दो अलग-अलग लक्षण एक साथ वंशागत होते हैं?
क्या बीज के ‘गोल’ होने का संबंध उसके ‘पीले’ होने से है? यह जानने के लिए मेंडल ने एक साथ दो लक्षणों (बीज का आकार और रंग) को ध्यान में रखकर प्रयोग किया। उन्होंने ‘गोल और पीले’ बीज वाले पौधे का संकरण ‘झुर्रीदार और हरे’ बीज वाले पौधे से कराया।
दूसरी पीढ़ी (F2) में उन्हें ऐसे नए पौधे भी मिले जो पहले कभी नहीं थे—जैसे ‘गोल लेकिन हरे’ बीज, और ‘झुर्रीदार लेकिन पीले’ बीज। इससे मेंडल ने स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम दिया। इसका मतलब है कि प्रत्येक लक्षण (जैसे बालों का रंग और आँखों का रंग) एक-दूसरे से बिल्कुल स्वतंत्र होकर बच्चों में जाते हैं। किसी एक लक्षण का दूसरे लक्षण से कोई लेना-देना नहीं होता।
अब खेलें: मेंडल और वंशागति के नियम क्विज़
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अध्याय 8 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: जनन के दौरान विभिन्नताओं का संचयन और उनका महत्व क्या है?
- भाग 2: आनुवंशिकता क्या है और वंशागत लक्षण कैसे काम करते हैं?
- You are Reading Here: लक्षणों की वंशागति में मेंडल का क्या योगदान है?
- भाग 4: लक्षण खुद को कैसे व्यक्त करते हैं और लिंग निर्धारण कैसे होता है?