प्रकृति में कोई भी जीव अकेला नहीं रह सकता। सजीव और निर्जीव चीज़ें आपस में मिलकर एक बहुत ही सुंदर और संतुलित सिस्टम बनाती हैं। आज के इस भाग में हम जानेंगे कि यह सिस्टम (पारितंत्र) क्या होता है, यह कितने प्रकार का होता है और इसमें उत्पादक, उपभोक्ता तथा अपघटक कौन-कौन सी भूमिका निभाते हैं। साथ ही, हम प्राकृतिक और मानव निर्मित पारितंत्र के उदाहरणों पर चर्चा करेंगे।
चलिए, सबसे पहले इस टॉपिक पर एक मज़ेदार क्विज़ खेलते हैं। क्विज़ शुरू होने से पहले आपको एक ज्ञान स्लाइड (Knowledge Slide) दिखाई जाएगी — उसे ध्यान से पढ़ें, फिर सवालों के जवाब दें। इस क्विज़ में आपको उत्पादक, उपभोक्ता, अपघटक और अजैव घटकों पर आधारित बहुत से प्रश्न मिलेंगे जो बोर्ड परीक्षा के लिए बेहद ज़रूरी हैं।
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पारितंत्र क्या होता है?
जब किसी क्षेत्र के सभी जीव (सजीव) तथा वातावरण के अजैव (निर्जीव) कारक आपस में मिलकर एक-दूसरे से क्रिया करते हैं तो एक स्व-नियमित तंत्र बनता है जिसे पारितंत्र (Ecosystem) कहते हैं। सरल शब्दों में कहें तो पेड़-पौधे, जानवर, मिट्टी, पानी, हवा और सूरज की रोशनी — ये सब एक साथ जुड़कर पारितंत्र का निर्माण करते हैं। पारितंत्र में सजीव और निर्जीव चीज़ें परस्पर अन्योन्यक्रिया (Interaction) करती हैं और प्रकृति में संतुलन बनाए रखती हैं। उदाहरण के लिए, एक तालाब का अपना पारितंत्र होता है जिसमें पानी, मछलियाँ, शैवाल, जीवाणु और मेंढक सभी शामिल होते हैं।
पारितंत्र के मुख्य घटक कौन से हैं?
एक पारितंत्र मुख्य रूप से दो प्रकार के घटकों से मिलकर बना होता है:
- जैव घटक: पारितंत्र के सभी सजीव प्राणी, जैसे- पौधे, जंतु, सूक्ष्मजीव और मानव, जैव घटक कहलाते हैं। इन्हें आगे उत्पादक, उपभोक्ता और अपघटक में बाँटा जाता है।
- अजैव घटक: पर्यावरण के सभी भौतिक (निर्जीव) कारक, जैसे- ताप, वर्षा, वायु, मृदा (मिट्टी) एवं खनिज, अजैव घटक कहलाते हैं। ये जीवों के जीवन के लिए आधार प्रदान करते हैं।
प्राकृतिक और मानव निर्मित पारितंत्र में क्या अंतर है?
पारितंत्र को उसकी उत्पत्ति के आधार पर दो भागों में बाँटा जा सकता है:
- प्राकृतिक पारितंत्र: जो पारितंत्र प्रकृति में अपने आप बनते हैं, प्राकृतिक पारितंत्र कहलाते हैं। उदाहरण: वन, तालाब, नदी, घास का मैदान तथा झील। ये बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के विकसित होते हैं और एक स्वाभाविक संतुलन बनाए रखते हैं।
- कृत्रिम पारितंत्र: जो पारितंत्र इंसानों द्वारा बनाए जाते हैं, उन्हें मानव-निर्मित (कृत्रिम) पारितंत्र कहते हैं। उदाहरण: बगीचा, खेत, जल जीवशाला (Aquarium) और एक्वापोनिक्स सिस्टम। इनमें संतुलन बनाए रखने के लिए मनुष्य का हस्तक्षेप ज़रूरी होता है।
उत्पादक, उपभोक्ता और अपघटक कौन होते हैं?
जीवन निर्वाह के आधार पर पारितंत्र के जीवों को तीन मुख्य वर्गों में बाँटा गया है:
- उत्पादक: वे सभी हरे पौधे और नील-हरित शैवाल, जो सूर्य के प्रकाश में प्रकाश-संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बना सकते हैं, उत्पादक कहलाते हैं। ये पारितंत्र की नींव होते हैं और सभी अन्य जीवों के लिए भोजन उपलब्ध कराते हैं।
- उपभोक्ता: वे जीव जो भोजन के लिए उत्पादकों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्भर करते हैं, उपभोक्ता कहलाते हैं। इन्हें खाने की आदत के अनुसार चार श्रेणियों में बाँटा जाता है — शाकाहारी (हिरण, खरगोश), मांसाहारी (शेर, बाज़), सर्वाहारी (मनुष्य, भालू) और परजीवी (जूँ, फीताकृमि)।
- अपघटक (अपमार्जक): जीवाणु और कवक जैसे सूक्ष्मजीव, जो मरे हुए जीवों और पौधों के अवशेषों को सड़ाकर सरल पदार्थों में बदल देते हैं, अपघटक कहलाते हैं।
अपमार्जकों की पर्यावरण में क्या भूमिका है?
अपमार्जक (सूक्ष्मजीव) हमारे पर्यावरण के ‘सफाई कर्मचारी’ हैं। ये जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं। ये सरल पदार्थ वापस मिट्टी में चले जाते हैं और पौधों द्वारा फिर से उपयोग में लाए जाते हैं। अगर अपमार्जक न हों, तो मरे हुए जंतुओं और पौधों का कचरा हर जगह फैल जाएगा, पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण रुक जाएगा और मृदा की प्राकृतिक पुनःपूर्ति नहीं हो पाएगी। इससे पूरा पारितंत्र असंतुलित हो सकता है। इसीलिए अपघटक पर्यावरण के लिए अति आवश्यक हैं।

अध्याय 13 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- You are reading here: पारितंत्र क्या है और इसके मुख्य घटक कौन से हैं?
- भाग 2: आहार श्रृंखला, आहार जाल और ऊर्जा का प्रवाह कैसे होता है?
- भाग 3: ओज़ोन परत का अपक्षय और कचरा प्रबंधन क्या है?
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