भाग 5: धातुओं की प्राप्ति और अयस्क से शुद्ध धातु का निष्कर्षण – Class 10 Science

क्या आपको लगता है कि खदानों में खुदाई करने पर हमें लोहे की चमकती हुई छड़ें या तांबे के साफ तार मिलते हैं? ऐसा बिल्कुल नहीं है! पृथ्वी की गहराई में धातुएँ मिट्टी, रेत और अन्य रसायनों के साथ चट्टानों के रूप में दबी होती हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे गन्ने के अंदर रस छिपा होता है, जिसे मशीनों से बाहर निकालना पड़ता है।

आज हम रसायन विज्ञान की उस बड़ी और औद्योगिक प्रक्रिया के बारे में जानेंगे, जिसके जरिए खदानों से निकली इन गंदी और अशुद्ध चट्टानों से बिल्कुल शुद्ध और चमकदार धातुएँ निकाली जाती हैं। इस पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया को ‘धातुकर्म’ (Metallurgy) कहते हैं।

खनिज और अयस्क में क्या अंतर है?

पृथ्वी की भूपर्पटी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले ठोस रासायनिक तत्वों या यौगिकों को खनिज कहते हैं। हम जमीन से जो भी पत्थर या मिट्टी खोदकर निकालते हैं, वह खनिज है। लेकिन हर खनिज से धातु निकालना आसान और फायदेमंद नहीं होता।

जिन विशेष खनिजों में धातु की मात्रा बहुत अधिक होती है और जिनसे फैक्ट्रियों में धातु निकालना हमारे लिए आर्थिक रूप से लाभकारी होता है, उन्हें अयस्क कहा जाता है। इसलिए कहा जाता है कि ‘सभी अयस्क खनिज होते हैं, लेकिन सभी खनिज अयस्क नहीं होते।’

सक्रियता श्रेणी के आधार पर धातुओं का निष्कर्षण

हम जानते हैं कि सभी धातुओं की ताकत (सक्रियता) अलग-अलग होती है। इसलिए चट्टानों से उन्हें बाहर निकालने का तरीका भी अलग-अलग होता है। वैज्ञानिकों ने इसे तीन हिस्सों में बाँटा है:

1. सक्रियता श्रेणी में सबसे नीचे आने वाली धातुएँ

सोना और चाँदी इतनी कम अभिक्रियाशील हैं कि ये पृथ्वी में स्वतंत्र रूप से मिलती हैं। लेकिन पारा (मर्करी) और तांबा अपने सल्फाइड अयस्क के रूप में मिलते हैं। पारे के अयस्क को ‘सिनाबार’ (HgS) कहते हैं। इन धातुओं को निकालने के लिए इनके अयस्क को हवा की उपस्थिति में बहुत अधिक गर्म किया जाता है। सल्फाइड अयस्क को हवा में गर्म करने की इस प्रक्रिया को भर्जन कहते हैं। भर्जन से धातु ऑक्साइड बनता है, जिसे और गर्म करने पर शुद्ध धातु मिल जाती है।

2. सक्रियता श्रेणी के मध्य में आने वाली धातुएँ

लोहा, जिंक और लेड जैसी धातुएँ सल्फाइड या कार्बोनेट अयस्क के रूप में मिलती हैं।

  • भर्जन: सल्फाइड अयस्क को हवा की मौजूदगी में गर्म करना भर्जन कहलाता है।
  • निस्तापन: कार्बोनेट अयस्क को सीमित हवा (या हवा के बिना) में बहुत तेज गर्म करना निस्तापन कहलाता है।

इन दोनों प्रक्रियाओं का मुख्य लक्ष्य अयस्क को ‘धातु ऑक्साइड’ में बदलना होता है। इसके बाद, कार्बन (कोयले) जैसे अपचायक का उपयोग करके उस ऑक्साइड में से ऑक्सीजन को खींच लिया जाता है। ऑक्सीजन को बाहर निकालने की इस प्रक्रिया को अपचयन कहते हैं, जिससे हमें धातु प्राप्त होती है।

3. सक्रियता श्रेणी में सबसे ऊपर आने वाली धातुएँ

सोडियम, कैल्सियम और एल्युमिनियम इतनी ताकतवर होती हैं कि कार्बन (कोयला) भी इनसे ऑक्सीजन नहीं छीन सकता। इसलिए इन्हें पिघली हुई अवस्था में लेकर उनमें बहुत तेज बिजली (विद्युत धारा) प्रवाहित की जाती है। इस प्रक्रिया को विद्युत अपघटनी अपचयन कहते हैं। बिजली के झटके से शुद्ध धातु अलग हो जाती है।

धातुओं का परिष्करण: 100 प्रतिशत शुद्धता

अपचयन की विधि से जो धातु हमें मिलती है, वह पूरी तरह शुद्ध नहीं होती। उसमें कुछ अशुद्धियां बची रहती हैं। इन अशुद्धियों को पूरी तरह हटाने और धातु को चमकाने के लिए विद्युत अपघटनी परिष्करण का उपयोग किया जाता है। इसमें अशुद्ध धातु की मोटी छड़ (ऐनोड) और शुद्ध धातु की पतली छड़ (कैथोड) का उपयोग करके बिजली गुजारी जाती है, जिससे सारी गंदगी नीचे बैठ जाती है और 100% शुद्ध धातु मिल जाती है।

👨‍🏫 शिक्षक की सलाह: बच्चों, बोर्ड परीक्षा में “भर्जन और निस्तापन में क्या अंतर है?” यह प्रश्न सबसे ज्यादा पूछा जाता है। हमेशा याद रखें: ‘भर्जन’ सल्फाइड अयस्क के लिए (हवा की उपस्थिति में) होता है, और ‘निस्तापन’ कार्बोनेट अयस्क के लिए (सीमित हवा में) होता है।

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यूपी बोर्ड कक्षा 10 विज्ञान के इस महत्वपूर्ण विषय पर आधारित मजेदार क्विज़ को खेलें और अपनी तैयारी को पक्का करें!

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