अभी तक हमने कार्बन यौगिकों के नाम और उनकी बनावट (संरचना) के बारे में सीखा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे घरों में जो रसोई गैस (LPG) जलती है, वह नीली लौ (Blue flame) के साथ क्यों जलती है? और जब हम सर्दियों में लकड़ी जलाते हैं, तो पीली लौ और काला धुआं क्यों निकलता है? इन दोनों में ही कार्बन है, फिर जलने का तरीका अलग क्यों?
आज के इस भाग में हम कार्बन यौगिकों के ‘रासायनिक गुणधर्मों’ को समझेंगे। हम जानेंगे कि कार्बन यौगिक ऑक्सीजन के साथ कैसे अभिक्रिया करते हैं, और वनस्पति तेल से ‘वनस्पति घी’ (डालडा) कैसे बनाया जाता है!
1. दहन (Combustion): कार्बन को जलाना
अपने सभी अपररूपों (जैसे कोयला, हीरा, ग्रेफ़ाइट) में कार्बन ऑक्सीजन की उपस्थिति में जलकर कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) गैस, ऊष्मा (गर्मी) और प्रकाश (रोशनी) देता है। इस जलने की प्रक्रिया को ही दहन कहते हैं। चूँकि कार्बन यौगिक जलने पर बहुत अधिक मात्रा में गर्मी पैदा करते हैं, इसलिए इन्हें एक बेहतरीन ‘ईंधन’ (Fuel) माना जाता है।
संतृप्त और असंतृप्त यौगिकों का दहन
- संतृप्त हाइड्रोकार्बन: ये सामान्यतः एक स्वच्छ नीली ज्वाला (लौ) के साथ जलते हैं। इनमें धुआं नहीं निकलता, इसलिए हमारे घर के बर्तन गैस चूल्हे पर काले नहीं होते हैं।
- असंतृप्त हाइड्रोकार्बन: ये जलने पर बहुत ज्यादा काले धुएं (कज्जली) के साथ पीली ज्वाला देते हैं। यही कारण है कि जब कुछ खास प्लास्टिक या रसायन जलते हैं, तो हवा में बहुत ज्यादा काला धुआं फैल जाता है।
(नोट: यदि गैस चूल्हे के छेद बंद हो जाएं और गैस को पूरी हवा न मिले, तो संतृप्त हाइड्रोकार्बन भी पीली लौ और धुएं के साथ जलने लगते हैं, जिससे बर्तन काले होने लगते हैं।)
2. ऑक्सीकरण (Oxidation)
दहन भी एक तरह का ऑक्सीकरण ही है, लेकिन रसायन विज्ञान में हम बिना जलाए भी कार्बन यौगिकों में ऑक्सीजन जोड़ सकते हैं। कुछ विशेष रसायन होते हैं, जैसे क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO4) या अम्लीकृत पोटैशियम डाइक्रोमेट (K2Cr2O7)। इन रसायनों की खासियत यह है कि ये दूसरों को ऑक्सीजन दान कर देते हैं, इसलिए इन्हें ऑक्सीकारक (Oxidizing Agents) कहा जाता है।
जब एथेनॉल (शराब) को इन ऑक्सीकारकों के साथ गर्म किया जाता है, तो यह उसमें ऑक्सीजन जोड़कर उसे एथेनॉइक अम्ल (सिरका) में बदल देते हैं।
3. संकलन अभिक्रिया (Addition Reaction)
असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (डबल या ट्रिपल बॉन्ड वाले) बहुत सक्रिय होते हैं। जब इनमें हाइड्रोजन गैस मिलाई जाती है, तो इनका डबल बॉन्ड टूट जाता है और वे ‘संतृप्त हाइड्रोकार्बन’ में बदल जाते हैं। इसे संकलन अभिक्रिया कहते हैं।
इस अभिक्रिया को तेजी से पूरा करने के लिए पैलेडियम (Pd) या निकेल (Ni) जैसे ‘उत्प्रेरक’ का उपयोग किया जाता है। (उत्प्रेरक वे पदार्थ होते हैं जो अभिक्रिया की गति को बढ़ा देते हैं, लेकिन खुद उसमें खर्च नहीं होते)।
औद्योगिक उपयोग: इसी प्रक्रिया का उपयोग करके कारखानों में अस्वास्थ्यकर ‘वनस्पति तेलों’ (असंतृप्त) में हाइड्रोजन गैस गुजार कर उन्हें ठोस ‘वनस्पति घी’ (संतृप्त वसा) में बदला जाता है। इसे हाइड्रोजनीकरण भी कहते हैं।
4. प्रतिस्थापन अभिक्रिया (Substitution Reaction)
संतृप्त हाइड्रोकार्बन बहुत शांत होते हैं, ये जल्दी किसी से नहीं जुड़ते। लेकिन जब सूरज की तेज रोशनी (सूर्य के प्रकाश) में मेथेन (CH4) की अभिक्रिया क्लोरीन (Cl2) गैस के साथ कराई जाती है, तो क्लोरीन बहुत आक्रामकता से मेथेन के एक-एक हाइड्रोजन को बाहर निकालकर उसकी जगह खुद ले लेती है। क्योंकि एक तत्व दूसरे तत्व की जगह (स्थान) ले रहा है, इसलिए इसे प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं।
अब खेलें: कार्बन के रासायनिक गुणधर्म क्विज़
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अध्याय 4 के अन्य महत्वपूर्ण भाग:
- भाग 1: कार्बन में सहसंयोजी आबंध और उसके अपररूप
- भाग 2: कार्बन की सर्वतोमुखी प्रकृति: संतृप्त और असंतृप्त यौगिक
- भाग 3: प्रकार्यात्मक समूह और समजातीय श्रेणी का रहस्य
- भाग 4: कार्बन यौगिकों की नामपद्धति (नामकरण)
- You are Reading Here: कार्बन यौगिकों के रासायनिक गुणधर्म (दहन और ऑक्सीकरण)
- भाग 6: एथनॉल, एथेनॉइक अम्ल और साबुन-अपमार्जक की सफाई प्रक्रिया