भाग 3: श्वसन तंत्र और ग्लूकोज़ का विखंडन – UP Board Class 10 Science

विज्ञान की इस महत्वपूर्ण कक्षा में आपका स्वागत है। हम सब जानते हैं कि जिंदा रहने के लिए खाना बहुत जरूरी है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस खाने से हमें काम करने की ताकत (ऊर्जा) कैसे मिलती है? जब हम साँस लेते हैं, तो हमारे शरीर के अंदर ऑक्सीजन जाती है। यही ऑक्सीजन हमारे खाए हुए भोजन को तोड़कर उसमें से ऊर्जा बाहर निकालती है।

विज्ञान की भाषा में भोजन को तोड़कर ऊर्जा निकालने की इस पूरी प्रक्रिया को ‘श्वसन’ (Respiration) कहते हैं। आज के इस भाग में हम जानेंगे कि हमारे शरीर में ग्लूकोज़ कैसे टूटता है, दौड़ते समय पैरों में दर्द क्यों होता है, और इंसानों के फेफड़े मछलियों के गलफड़ों (Gills) से कैसे अलग हैं।

ग्लूकोज़ का विखंडन

पाचन के बाद भोजन का सबसे सरल रूप ‘ग्लूकोज़’ होता है। कोशिकाओं के कोशिकाद्रव्य में यह ग्लूकोज़ सबसे पहले टूटकर एक तीन-कार्बन वाले अणु में बदलता है, जिसे पायरुवेट (Pyruvate) कहते हैं। इसके बाद यह पायरुवेट तीन अलग-अलग रास्तों से ऊर्जा में बदल सकता है:

1. ऑक्सीजन की उपस्थिति (वायवीय श्वसन)

मनुष्यों और ज्यादातर जीवों में पायरुवेट ऑक्सीजन की मदद से माइटोकॉन्ड्रिया के अंदर टूटता है। इस प्रक्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड, पानी और बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा निकलती है। इसे वायवीय (Aerobic) श्वसन कहते हैं।

2. ऑक्सीजन का अभाव (मांसपेशियों में)

जब हम बहुत तेज दौड़ते हैं या भारी कसरत करते हैं, तो हमारी मांसपेशियों की कोशिकाओं को पूरी ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। ऐसे में पायरुवेट टूटकर लैक्टिक अम्ल बन जाता है। इसी लैक्टिक अम्ल के अचानक बनने के कारण हमारी मांसपेशियों में ऐंठन (Cramps) और दर्द होने लगता है।

3. ऑक्सीजन की अनुपस्थिति (अवायवीय श्वसन)

यीस्ट (Yeast) जैसे कुछ छोटे जीव बिना ऑक्सीजन के ही श्वसन करते हैं। इसमें पायरुवेट टूटकर इथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड बनाता है। इसे अवायवीय (Anaerobic) श्वसन कहते हैं। इसमें ऊर्जा बहुत कम निकलती है।

ए.टी.पी. (ATP): कोशिका की ऊर्जा मुद्रा

श्वसन प्रक्रिया में जो भी ऊर्जा पैदा होती है, वह कोशिका के अंदर ATP (एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट) नामक अणु के रूप में जमा हो जाती है। आप इसे शरीर की ‘बैटरी’ समझ सकते हैं। जब भी शरीर की मांसपेशियों को काम करने के लिए ताकत चाहिए होती है, तो वे इसी ATP को खर्च करती हैं।

जलीय और स्थलीय जीवों में श्वसन

पानी में रहने वाले जीव (जैसे मछली) साँस लेने के लिए क्लोम (Gills) का इस्तेमाल करते हैं। चूँकि पानी में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा हवा के मुकाबले बहुत कम होती है, इसलिए मछलियों को बहुत तेजी से साँस लेनी पड़ती है। दूसरी तरफ, जमीन पर रहने वाले जीव हवा से ऑक्सीजन लेते हैं, इसलिए उनके साँस लेने की गति सामान्य होती है।

मानव श्वसन तंत्र

इंसानों में साँस लेने के लिए एक बहुत ही व्यवस्थित तंत्र होता है:

  • नासाद्वार (Nostrils): हवा नाक के छेदों से अंदर जाती है, जहाँ बाल और श्लेष्मा धूल-मिट्टी को रोक लेते हैं।
  • श्वासनली और कंठ: हवा गले से होती हुई फेफड़ों की तरफ जाती है। गले में उपास्थि के वलय (Cartilage rings) होते हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि हवा का रास्ता कभी सिकुड़ कर बंद न हो जाए।
  • फुफ्फुस (Lungs) और कूपिकाएँ (Alveoli): फेफड़ों के अंदर जाकर साँस की नली छोटी-छोटी शाखाओं में बँट जाती है और अंत में गुब्बारे जैसी आकृतियाँ बनाती है, जिन्हें कूपिका कहते हैं। इन कूपिकाओं में खून की नसें होती हैं, जो हवा से ऑक्सीजन को खींचकर पूरे शरीर में ले जाती हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर छोड़ देती हैं।
  • हीमोग्लोबिन: खून में मौजूद लाल रंग का हीमोग्लोबिन फेफड़ों से ऑक्सीजन को पकड़कर शरीर की हर कोशिका तक पहुँचाने का काम करता है।

अब खेलें: श्वसन तंत्र और ग्लूकोज़ क्विज़

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