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भाग 4: लक्षण खुद को कैसे व्यक्त करते हैं और लिंग निर्धारण कैसे होता है?

पिछले भागों में हमने मेंडल के नियमों के बारे में पढ़ा और जाना कि माता-पिता के गुण बच्चों में जाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एक ‘जीन’ (Gene) आखिर ऐसा क्या करता है कि पौधे की लंबाई बढ़ जाती है या हमारी आँखों का रंग काला हो जाता है?

और सबसे बड़ा सवाल जो हर किसी के मन में आता है कि बच्चे का जन्म से पहले ही लड़का या लड़की होना कैसे तय होता है? आज के इस अंतिम भाग में हम कोशिका के अंदर होने वाले रासायनिक जादुओं को समझेंगे और मानव में लिंग निर्धारण की पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया को जानेंगे।

कोशिका में लक्षण खुद को कैसे व्यक्त करते हैं?

हमारे शरीर की हर एक कोशिका के अंदर डीएनए (DNA) मौजूद होता है। यह डीएनए प्रोटीन बनाने का एक सूचना तंत्र (Information source) है। डीएनए का वह हिस्सा जो किसी एक खास प्रोटीन को बनाने की सूचना देता है, उसे उस प्रोटीन का जीन कहते हैं।

यह प्रोटीन ही हमारे शरीर के लक्षणों को कंट्रोल करता है। आइए इसे पौधे की लंबाई के उदाहरण से समझते हैं:

पौधे की लंबाई का उदाहरण क्या है?

हम जानते हैं कि पौधे की लंबाई उसमें मौजूद वृद्धि हॉर्मोन की मात्रा पर निर्भर करती है। अगर हॉर्मोन ज्यादा बनेगा तो पौधा लंबा होगा, और कम बनेगा तो पौधा बौना रह जाएगा।

हॉर्मोन कितना बनेगा, यह एक ‘एंजाइम’ (जो कि एक प्रोटीन है) पर निर्भर करता है। अगर पौधे के डीएनए में मौजूद जीन बिल्कुल सही काम कर रहा है, तो एंजाइम अच्छी तरह काम करेगा, ढेर सारा हॉर्मोन बनेगा और पौधा लंबा हो जाएगा। लेकिन अगर जीन में कोई बदलाव (विभिन्नता) आ जाए जिससे एंजाइम कम बने, तो हॉर्मोन भी कम बनेगा और पौधा बौना रह जाएगा। इस तरह एक जीन हमारे शरीर के लक्षणों को कंट्रोल करता है।

लिंग निर्धारण क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

यह तय करना कि जन्म लेने वाला नया जीव नर (लड़का) होगा या मादा (लड़की), लिंग निर्धारण कहलाता है। अलग-अलग जीवों में लिंग तय करने के तरीके बिल्कुल अलग होते हैं।

क्या सभी जीवों में लिंग निर्धारण आनुवंशिक होता है?

नहीं! सभी जीवों में लिंग का निर्धारण माता-पिता के जीन से नहीं होता।

  • तापमान पर निर्भर: कुछ रेंगने वाले जीवों (जैसे कुछ कछुए और छिपकलियों) में यह बात पर्यावरण के तापमान पर निर्भर करती है कि अंडे के अंदर पलने वाला बच्चा नर बनेगा या मादा।
  • लिंग बदलना: ‘घोंघा’ जैसे कुछ जीव तो इतने अजीब होते हैं कि वे अपनी मर्जी से अपना लिंग बदल सकते हैं! इससे यह साबित होता है कि घोंघे में लिंग का निर्धारण आनुवंशिक (जीन द्वारा) नहीं होता।

मानव में बच्चे का लिंग कैसे तय होता है?

मानव (इंसानों) में बच्चे का लिंग पूरी तरह से आनुवंशिक होता है, यानी यह माता-पिता से मिलने वाले गुणसूत्रों (Chromosomes) पर निर्भर करता है।

मानव की हर कोशिका में 23 जोड़े (कुल 46) गुणसूत्र होते हैं। इनमें से 22 जोड़े तो लड़के और लड़की दोनों में बिल्कुल एक जैसे होते हैं। लेकिन 23वाँ जोड़ा जो हमारा लिंग तय करता है, उसे लिंग गुणसूत्र कहते हैं।

माता और पिता के लिंग गुणसूत्रों में क्या अंतर है?

  • महिलाओं (माता) में: लिंग गुणसूत्र का एक पूर्ण जोड़ा होता है, जिसे XX कहते हैं। (यानी माता हमेशा अपने बच्चे को ‘X’ गुणसूत्र ही दे सकती है)।
  • पुरुषों (पिता) में: लिंग गुणसूत्र का जोड़ा समान नहीं होता। इसमें एक सामान्य आकार का ‘X’ होता है और एक बहुत छोटा ‘Y’ होता है, जिसे XY कहते हैं।

लड़का या लड़की होने का फैसला कैसे होता है?

जब जनन होता है, तो बच्चे को माता से तो हमेशा ‘X’ गुणसूत्र ही मिलता है। इसलिए बच्चे का लिंग पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि उसे अपने पिता से कौन सा गुणसूत्र मिला है:

  1. अगर पिता से बच्चे को ‘X’ गुणसूत्र मिलता है, तो बच्चे का जोड़ा ‘XX’ बन जाएगा और वह एक लड़की (मादा) होगी।
  2. अगर पिता से बच्चे को ‘Y’ गुणसूत्र मिलता है, तो बच्चे का जोड़ा ‘XY’ बन जाएगा और वह एक लड़का (नर) होगा।

इसलिए यह बात बिल्कुल वैज्ञानिक है कि जन्म लेने वाले बच्चे का लिंग पूरी तरह से पिता के गुणसूत्रों पर निर्भर करता है, न कि माता पर।

अब खेलें: लक्षण और लिंग निर्धारण क्विज़

अब नीचे दिए गए ‘Play Quiz’ बटन पर क्लिक करें और जीन, हॉर्मोन और लिंग निर्धारण पर आधारित इन 20 महत्वपूर्ण विज्ञान प्रश्नों का अभ्यास करें!

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